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(व्यंग्य) वोट चोरी का रोना रोते-रोते वैकेशन पर निकले कैप्टन

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(व्यंग्य) वोट चोरी का रोना रोते-रोते वैकेशन पर निकले कैप्टन


- विनय के पाठक

देश की राजनीति में इन दिनों बड़ा विचित्र नजारा देखने को मिल रहा है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोल रखा है, मानो देश में विपक्ष की हार-जीत का पूरा रिमोट कंट्रोल एक ही आदमी के हाथ में हो। विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। लिहाजा, उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी से हटा कर किसी दूसरे सज्जन को बैठा दिया जाए तो लोकतंत्र की गाड़ी अचानक विपक्ष की दिशा में दौड़ने लगेगी और सत्ता की मंजिल अपने आप करीब आ जाएगी।

यानी चुनाव हारने का कारण जनता की नाराजगी, संगठन की कमजोरी, नेतृत्व की सीमाएं या अपनी राजनीतिक गलतियां नहीं बल्कि ज्ञानेश कुमार हैं! वाह रे लोकतंत्र! जनता वोट देती है, पार्टियां चुनाव लड़ती हैं लेकिन हार का ठीकरा फोड़ने के लिए एक अदद सिर हमेशा तैयार रहना चाहिए। आखिर आत्ममंथन भी कोई चीज होती है मगर उससे ज्यादा सुविधाजनक है कि अपनी कमियों की जगह किसी दूसरे की कुर्सी को दोष दे दिया जाए।

टीवी पत्रकारिता में दो एब्रेविएशंस की काफी चर्चा होती है। पहला है सीसी और दूसरा टीटी। सीसी मतलब क्रेडिट चोरी। प्लान किसी ने किया हो, मेहनत किसी ने किया हो लेकिन जब सबकुछ ठीक हो जाए तो क्रेडिट लेने के लिए खुद आगे आ जाओ। इसके सीसी कहते हैं। इसी तरह अपनी प्लानिंग से हुआ काम अगर बिगड़ जाए तो तुरंत उसका ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ दो-इसको टीटी यानी टोपी ट्रांसफर कहते हैं।

तो भैया, आजकल विपक्ष की राजनीति में भी टीटी का खेल जम कर हो रहा है। विपक्ष चुनाव अपनी गलत नीतियों, योजनाओं और सुस्त प्रचार के कारण हारता है लेकिन इस हार का ठीकरा पहले ईवीएम पर फूटता था लेकिन अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर फूटने लगा है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि वोट चोरी हो रही है, ममता बनर्जी और इसी तरह के तमाम हारने वाले कह रहे हैं कि वोट चोरी हो रही है।

इसी वोट चोरी के मुद्दे को लेकर राहुल गांधी कभी धरने पर बैठते हैं, कभी आकाशवाणी भवन में घुसने की कोशिश करते हैं, कभी सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर अपनी आवाज बुलंद करने पहुंचते हैं तो कभी युवाओं के बीच जाकर छात्रों की गूंज जैसे कार्यक्रमों के जरिए अपनी बात रखते हैं। राजनीति में सक्रियता जरूरी है और सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार भी। लेकिन सवाल यह है कि इस सारी कवायद का हासिल क्या है? क्या जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब मिल रहा है या फिर राजनीति का पूरा थिएटर ही सजाया जा रहा है, जिसमें मुद्दा कम और मंचन ज्यादा दिखाई देता है?

इसी बीच राजनीति के नाले से एक नई आवाज सुनाई देने लगी है। राजनीतिक तिलचट्टों की पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी भी मैदान में कूद पड़ी है। पार्टी के नेताओं को लगा कि जब बड़े-बड़े राजनीतिक दल वोट चोरी के मुद्दे पर अपनी-अपनी दुकान सजा रहे हैं तो वे भी पीछे क्यों रहें? आखिर तिलचट्टे भी लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। उनका मानना है कि राजनीति की गंदगी में अगर बड़े खिलाड़ी अपना भविष्य तलाश सकते हैं, तो उनके लिए भी अवसरों की कमी नहीं होनी चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी के आने से आंदोलन में एक नया जैविक आयाम जुड़ गया है। अब तक बहस चुनाव आयोग, वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इर्द-गिर्द घूम रही थी; अब इसमें राजनीतिक तिलचट्टों की भागीदारी भी सुनिश्चित हो गई है। जनता सोच रही है कि लोकतंत्र की इस प्रयोगशाला में अगला प्रयोग क्या होगा- चुनाव सुधार या राजनीतिक कीट-पतंगों का पुनर्वास?

लेकिन ठहरिए! कहानी में असली ट्विस्ट बाकी है

जिस आंदोलन को अभी और जोर पकड़ना था, जिस राजनीतिक लड़ाई में कॉकरोच जनता पार्टी की भूमिका का विस्तार होना था और जिस मुद्दे पर विपक्ष को सरकार तथा चुनाव आयोग को लगातार घेरना था, उसी बीच खबर आती है कि राहुल गांधी बोरिया-बिस्तर बांध कर विदेश रवाना हो गए हैं। आंदोलन अपने स्थान पर, आरोप अपने स्थान पर और कॉकरोच जनता पार्टी अपनी संभावनाओं के साथ अपने स्थान पर लेकिन सेनापति माने कि कांग्रेस के युवराज ने फिलहाल अपनी विदेश की छुट्टी को प्राथमिकता दे दी!

अब विरोधियों को तंज कसने का मौका मिल गया है। वे पूछ सकते हैं कि जब लोकतंत्र कथित रूप से खतरे में हो, वोट चोरी का मुद्दा गरम हो और राजनीतिक तिलचट्टे भी समर्थन देने आ पहुंचे हों, तब नेतृत्व को मैदान में रहना चाहिए या विदेश में छुट्टी मनानी चाहिए? हालांकि राहुल गांधी को भी दूसरे नागरिकों की तरह निजी जीवन जीने और आराम करने का अधिकार है। मगर राजनीति में समय का भी अपना व्यंग्य होता है। छुट्टी गलत नहीं होती लेकिन उसकी टाइमिंग कभी-कभी विरोधियों के लिए मुफ्त का चुनावी भाषण बन जाती है।

अब कॉकरोच जनता पार्टी के सामने भी चुनौती है। वह आंदोलन को आगे बढ़ाएगी या अपने नेता के लौटने तक राजनीतिक अंधेरे में सीलन भरी दीवारों से चिपकी रहेगी? कहीं ऐसा न हो कि राहुल गांधी की अनुपस्थिति में आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी तिलचट्टों पर आ जाए और वे ही वोट चोरी के मुद्दे को रेंगते-रेंगते अगले चुनाव तक ले जाएं!

बहरहाल, लोकतंत्र के इस दिलचस्प ड्रामा में जनता दर्शक भी हैं और असली निर्णायक भी। जनता को ही तय करना है कि कौन सचमुच उसके वोट की चिंता करता है और कौन हार के बाद कारणों की तलाश में नई-नई कहानियां गढ़ता है। लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में सबको अपनी-अपनी भूमिका निभानी है। कोई धरना दे रहा है, कोई विदेश जा रहा है और कोई राजनीति की सीलन भरी दीवार पर चढ़ कर मौके का इंतजार कर रहा है। बस जनता सोच रही है कि इस पूरे तमाशे में उसका वोट आखिर किसके काम आ रहा है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक