सुविधा की राजनीति और शिक्षा जगत की दुविधा
गिरीश्वर मिश्र
लोकतंत्र के आधुनिक परिवेश में सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उथल-पुथल आम बात है। विकसित और विकासशील सभी तरह के देशों में, जहाँ लोकतांत्रिक सरकारें सत्ता की बागडोर संभाल रही हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल है। वहाँ तमाम चीज़ों को लेकर बहसें होती रहती हैं। ऐसे में विभिन्न मुद्दों पर राजनैतिक दलों की अलग-अलग राय भी होती है। यह स्थिति बहुत हद तक स्वस्थ राजनीतिक प्रवृत्ति को दर्शाती है। सच कहें तो असहमति को आदर देना सभ्य समाज की वैचारिक परिपक्वता का परिचायक होता है।
भारत जैसे देश में जहाँ राष्ट्रीय स्तर की छह और क्षेत्रीय स्तर की साठ राजनीतिक दलों की संख्या है वैचारिक मतभेद होना सहज और स्वाभाविक है। ऊपर से क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक तथा आर्थिक विविधतायें भी बहुत तरह की हैं। ऐसी बहुलताओं वाले देश में किसी प्रश्न पर भिन्न प्रकार के विचारों को राजनैतिक विमर्श में सहनशीलता के साथ सम्मानजनक जगह मिलनी चाहिए। अक्सर विरोध की गुंजाइश न होने पर लोकतांत्रिक संस्थाएं और उनकी गतिविधियाँ पटरी से उतर कर ठप पड़ जाती हैं। देश में जब आपातकाल लगा था तब कुछ ऐसा ही हुआ था। इतिहास गवाह है कि देश ने उस कदम को नकार दिया था और जेपी के नेतृत्व में बड़ा बदलाव आया और वह एक प्रस्थानविंदु बन गया। उसके बाद किसी एक दल का राजनीतिक वर्चस्व खत्म हो गया। ऐसे में पारस्परिक वाद, विवाद और संवाद राजनीतिक अनिवार्यता बन चुकी है।
गौरतलब है संविधान सभा की बहसों और उसके बाद देश के संसदीय इतिहास में भी अनेक अवसरों पर संसद में तीखी बहसें होती रही हैं। कई सांसदों के वक्तव्यों में ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति-सभ्यता की बातें भी हुआ करती थीं और हास्य-विनोद का पुट भी रहता था। इनसे लोगों को सीखने को भी बहुत कुछ मिलता था। कुछ समय से इस तरह की परम्परा से अलग हट कर संसद में चल रही गतिविधि देखते-सुनते हुए आमजन हतप्रभ हैं और उनकी चिंता बढ़ती रही है। अब संसद परिसर का वातावरण गंभीर विचार-विनिमय की जगह नाटकीय अभिनय के प्रदर्शन का मंच सा होता जा रहा है। संसद के भीतर और बाहर बार-बार मान्यवरों की ओर से ऐसा होना आमजन को निराश करने वाला है।
इससे किसी दल कितना राजनैतिक लाभ मिलता है ये तो वे ही जानें पर ऐसे ग़ैरज़िम्मेदार आचरण से तात्कालिक रूप से देश के संसाधनों का अपव्यय तो निश्चित रूप से होता है। यह अलग बात है कि इसकी ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता है। साथ ही जनता को अवांछित संदेश भी जाता है। संसद का पूरा का पूरा सत्र कोरा बीत जाता है और उसके काम धरे के धरे रह जाते हैं या फिर आपाधापी में बिना विचारे निपटा लिए जाते हैं। दोनों ही हाल में यह एक जोखिम वाली बात है, पर यह प्रवृत्ति रुकने का नाम नहीं ले रही है। समस्याओं पर विचार करने और उनकी ओर ध्यान आकृष्ट करने का जो अभिनव तरीका उभर रहा है वह संसद की गरिमा के विरुद्ध है।
अलबत्ता सांसदों को अन्न, जल तथा पर्यटन और कार्य के भत्ते आदि की तरह-तरह की सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। सांसद होने के लाभ उन्हें मिलते रहते हैं। उन्होंने अपने लिए नीति बना रखी है ताकि सुविधाएं बिना बंदिश के मिलती रहें। सुविधा सबको चाहिए, राजा को भी और प्रजा को भी। राजनीति सुविधाभोगी हो रही है और लोक-जीवन के सरोकार पिछड़ते जा रहे हैं। जनता की नियति असुविधा भोगने की है। उसकी लाचारी और विवशता कई-कई मोर्चों जारी है।
आजकल राजनीति में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष में ठनी हुई है और संसद में गतिरोध जारी है। इस खेदजनक रुकावट की त्रासदी देश में शिक्षा की समस्याओं से जुड़ी हुई है। बावजूद इसके शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है केंद्र और राज्यों की सरकार हो या संसद, शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण और बुनियादी प्रश्नों की लगातार उपेक्षा होती आ रही है। चर्चाओं में सभी विषयों पर ध्यान देने के बाद शिक्षा की बारी आती है और इस पर सतही तौर पर नजर डाली जाती है और रस्म अदायगी निभाई जाती है।
शिक्षा एक ऐसा विषय है जिसके लिए कोई विशिष्ट योग्यता भी नहीं चाहिए इसलिए किसी को भी इसे सुपुर्द कर दिया जाता है। साथ ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस अर्थ में अनूठी है कि इसमें अपनी शिक्षा पर भरोसा नहीं है। मसलन हायर सेकेंड्री से बीए/ बीएससी और बीए/ बीएससी से एमए/ एमएससी में प्रवेश के लिए किस्म-किस्म की परीक्षाओं का एक बड़ा जाल बना रखा है। प्रवेश-परीक्षाओं की बड़ी लंबी सूची है जिसमें विद्यार्थी को लगातार पात्रता सिद्ध करते रहना है। सिर्फ़ पढ़ाई काफ़ी नहीं है; प्रवेश-परीक्षाएँ शिक्षा-क्रम में आगे कदम बढ़ाने के लिए सीढ़ी बन गई हैं। इस मद्देनजर मददगार कोचिंग संस्थानों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
पर ताजा संदर्भ में परीक्षा कराने की चाक-चौबंद राष्ट्रीय व्यवस्था (एनटीए) ही बड़ी चुनौती बन गई। नीट के पेपर लीक की बार-बार की घटनाओं ने छात्रों के भरोसे को तोड़ दिया पर इसकी अनदेखी होती रही। इसका परिणाम युवा-आक्रोश के रूप में उभरा। दुखी होकर आज जेनरेशन ज़ेड और जेनरेशन अल्फा ने तीव्र स्वर में अपनी बात उठाने का संकल्प कर लिया। हम सबने देखा कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के उग्र प्रदर्शन के आगे सरकार को बाध्य होकर कई कड़े कदम उठाने पड़े और तब जाकर कहीं आंदोलन थमा।
इस घटनाक्रम ने यह भलीभाँति प्रकट कर दिया कि प्रश्नों का टालते रहना या उन पर कारवाई न करने की बड़ी क़ीमत अदा करनी पड़ती है। लोकतंत्र जनता के लिए होता है और उसकी आवाज़ का बड़ा महत्व होता है। आज जब संचार के साधन बहुत बढ़ चुके हैं, लोकमत की तरफ़ से मुँह मोड़ लेना या आँख बंद रखना और ख़तरनाक हो रहा है। अब झारखंड में परीक्षाओं में धांधली को लेकर छात्रों का धरना-प्रदर्शन जारी है।
परीक्षा के पेपर बार-बार लीक होना शर्मनाक है और अब सरकार उसका संज्ञान लेकर सख्त कदम उठा रही है। परंतु शिक्षा के सवाल केवल परीक्षा तक सीमित नहीं हैं। राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश आदि कई राज्यों में सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत बता रही है कि शिक्षा की आधारशिला कमजोर हो रही है। बहुतेरे विद्यालयों में न तो शौचालय जैसी सामान्य सुविधाएं हैं न ही पढ़ने-पढ़ाने के लिए पर्याप्त अध्यापक हैं। अनुमानतः देश में एक लाख स्कूल ऐसे हैं जहाँ केवल एक अध्यापक है और वही सभी कक्षाओं को पढ़ाता है। ऐसे एकल शिक्षक विद्यालयों की संख्या बढ़ रही है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग 28 प्रतिशत और राज्यों के विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के लगभग 40 से 60 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। भर्ती की प्रक्रिया समय पर न हो पाना और विकट नौकरशाही के झमेलों के चलते प्राध्यापकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। फलतः ज्यादातर जगहों पर अतिथि अध्यापकों से काम चलाया जा रहा है। स्ववित्त पोषित (सेल्फ-फाइनेंस्ड) पाठ्यक्रम भी चल रहे हैं जिनकी अपनी मुश्किलें हैं। निजी क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार में आशातीत वृद्धि हुई है। प्राइमरी से विश्वविद्यालय तक विस्तृत ये निजी प्रयास व्यापारिक माडल पर चल रहे हैं और मुख्यतः धनार्जन के उद्यम हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की शिक्षा-संस्थाओं की सीमाओं के कारण ये खूब फल-फूल रहे हैं।
वर्तमान सरकार ने शिक्षा में रुचि ली और उत्साहपूर्वक 2020 में एक नई शिक्षा नीति का ऐलान किया। तब से उस पर अमल चल रहा है, पर किसी भी बदलाव की तरह यह भी पेचीदा है। बड़े परिवर्तन के लिए अपेक्षित संसाधन और जरूरी तैयारी भी चाहिए। इस महत्वाकांक्षी बदलाव ने शिक्षा-जगत के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। आज तक राष्ट्रीय बजट का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्चने का वादा पूरा नहीं हो सका है जबकि जनसंख्या में वृद्धि के हिसाब से शिक्षा के लिए इससे भी ज़्यादा संसाधन आवंटित होना चाहिए। इस बीच संख्या की दृष्टि शिक्षा-संस्थानों में इजाफा तो जरूर हुआ परंतु गुणवत्ता की दृष्टि से स्थिति संतोषप्रद नहीं कहीं जा सकती। ऐसे में जरूरी है कि शिक्षा के प्रश्नों पर समग्रता में विचार किया जाय। देश की जनसंख्या में 65 प्रतिशत बच्चे, किशोर और युवा हैं। इसलिए यथार्थ के धरातल पर आवश्यकता का आकलन कर संसाधनों, परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों के बीच तालमेल बैठाना अत्यंत आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ ही सामाजिक–आर्थिक उन्नति की यात्रा हो सकेगी।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

