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समकालीन साहित्य और स्मृतियों का साक्ष्य

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समकालीन साहित्य और स्मृतियों का साक्ष्य


परिचय दास

लोक में जो संकेत, आत्मीय रचाव और सहज संचरणशीलता है, वह अतिआधुनिकता में भी स्वीकार्य है, उपयोगी है। लोक-रचनात्मकता का आधारपरक कार्य लोककला की कलात्मक एकता है। अतीत का उपयोग वर्तमान की आलोचना के बिना संभव नहीं। बिना आकांक्षा के न तो जीवन जिया जा सकता है और न ही कविता या साहित्य की रचना संभव है। समकालीन साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण है- स्मृतियों का साक्ष्य। स्मृतियां समकालीनता के विविध उपकरणों के समाहार से असंबद्ध नहीं रह सकतीं। हालांकि तार्किकता, परिवर्तनधर्मिता, शिल्प वैशिष्ट्य, गद्यपरकता इत्यादि संश्लिष्टताओं से आकार ग्रहण करता समकालीन साहित्य स्मृतिविहीन नहीं हो सकता फिर भी लोकोन्मुखता लगातार क्षीण होती गई है। स्थानीयता का पुट विविध रंगों के साथ जैसे उभरने चाहिए, उसमें कमी आती दिख रही है।

कुछ कवियों व उपन्यासकारों ने मौखिक परंपराओं व धरती के उन्मुखीकरण को आधार बनाने का यत्न किया है तो कुछ लोक को नए सिरे से समझ कर लाना चाहते हैं। कुछ कला और समुदाय के बीच के संबंधों से काम करते हैं तो कुछ लोकप्रिय रूपों व ध्वनियों के आधार पर। कुछ सामाजिक आवेग को लोक संस्कृति में समंजन करके नई भाषा रच रहे हैं तो कुछ काव्य-अभ्यास से लोक कविता की संभावनाओं के लिए नई सदी में नए दृष्टिकोण से सक्रिय हैं। लोक संस्कृति की प्रमुख आधार प्रकृति महानगरों से जैसे ओझल हुई है, उससे लेखन-सूत्र की दशा बदल गई है। प्रकृति, नदी, पर्यावरण में जैसी स्मृतियां रही हैं तथा साहित्य की धारा का जैसे गोमुख रहा है, नगरीकरण की स्थिति के चलते (अब हिन्दी साहित्य भी नगरीकरण का प्रतीक होने लगा है) स्वप्न के संदर्भ बदल गए हैं। यह सारा स्वप्न छंदमुक्तता की प्रयोजनता और वाक्यांशों की विविधताओं से भी पता चलता है।

लोक की रुचियों व अनेक जड़ताओं को साहित्य में जायज नहीं ठहराया जाना चाहिए, लेकिन उसकी तरलता या प्रवाहमयता या सुगंध का खोना स्मृति-रहित होने जैसा ही है। साहित्य का नगरीकृत होना एक फेज है, लेकिन पारंपरिक अनुगूंजों से वंचित होना दूसरी बात। स्थानीयता के कई तरह के खतरे भी हैं किंतु उसकी अलग आभा उसकी शक्ति भी है। प्रौद्योगिकी को स्थानीयता में खास व्यवहार मिलता है। साहित्य में स्थानीय संस्कृति को रचना एक खास सम्मोहन को शब्द देना है। उस सम्मोहन में एक गति भी होती है। कलात्मक प्रासंगिकता का दृश्यात्मकता व सांगीतिक अनुगूंजों से विशिष्ट संबंध है। इसीलिए लोक में जो दृश्यबंध आते हैं, उन्हें साहित्य में एक आकार दिया जा सकता है। यह अलग बात है कि समकालीनता के तनावों व लोक के समंजन का आधार क्या बनेगा या बनना चाहिए, यह विचार व अनुप्रयोग का विषय है।

नए-नए विषयों को उठाते हुए मिथक व लोक का समकालीनीकरण संभव है। कथा व कविता में तो यह विशिष्ट आकार ले ही सकता है। यदि नगरीय जीवन की संपृक्ति में लोक कविता की मूर्धन्यता को समझा जाए तो कुछ अनुभव एकत्र किए जा सकते हैं। उससे प्रस्तुति व शैली में निश्चित भिन्नताएं आएंगी। लोक संगीत के लिए ''यू ट्यूब'' के रूप में एक नया आधार मिला है। सामूहिक कलात्मक गतिविधि, सामाजिक काम, रोजमर्रा की जिंदगी, जीवन व प्रकृति के ज्ञान, धार्मिक प्रथाओं और विश्वासों को साहित्य में ढाल पाना इकहरा कार्य नहीं। लोक-रचनात्मकता का विशिष्ट आधारपरक कार्य लोककला की कलात्मक एकता है। लोक कला समाज के निचले तबके की आवश्यकताओं की उपस्थितियों के लिए निर्मित होती है। इसमें एक तरह का घरेलूपन है। चाहें तो उसकी ''पुरातनता'' में एक नवाचार भी ला दें।

कविता में पुरातनता में नवसंघनन उसका महत्वपूर्ण पक्ष है। लोक में जो संकेत, आत्मीय रचाव और सहज संचरणशीलता है, वह अति आधुनिकता में भी स्वीकार्य है, बल्कि बहु उपयोगी। अतीत का उपयोग वर्तमान की आलोचना के बिना संभव नहीं। बिना आकांक्षा न तो जीवन जिया जा सकता है और न ही कविता या साहित्य की रचना संभव है।

लोक को सस्ते फैशन परस्ती के रास्ते पर ले जाने, उसे उपभोक्तावादी सिस्टम में खपाने और तदनुकूल साहित्य के सरलीकरण को स्तरहीनतापूर्वक बल देने की भी कोशिशें जारी हैं। यह ऐसा प्रश्न है जो हमारे मानसतंत्र को बहुत बारीकी से झकझोरता है। जो लोकगीत अपने एक आम अतीत की रचनात्मक अभिव्यक्ति व समकालीन चेतना से जुड़ा है, उसे बाजार की इच्छाओं की झोंक में सौंपा जा रहा है। बाजार से सहयोग लेना बुरा नहीं, बाजार में जाना भी सहज है, किंतु उसके तंत्र का अनुकर्ता मात्र हो जाना मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। जबकि साहित्य और लोक के अंतर्सबंध किसी भी अन्य अनुशासन की तरह हमें स्वयं को बेहतर और दूसरों को समझने के लिए सक्षम बनाते हैं। सारा मनोविज्ञान व समाजशास्त्र लोक सन्दर्भ में उपलब्ध हैं। यदि ऐसा न होता तो रामायण व महाभारत शास्त्र से लोक न बन जाते।

जब हम आंख खोलते हैं तथा स्मृति-संपन्न होते हैं तो भारतीय समाजों में रामायण व महाभारत को सुनकर अपनी स्मृति को धरती पर उतार लेते हैं। लोक संस्कृति के आत्मीय संचरण को समकालीन साहित्य में मानव अभिव्यक्ति के जबर्दस्त स्पेक्ट्रम की तरह लिया जाना चाहिए। लोक कला पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के माध्यम से सामूहिक कथन है, जीवन के साझे मार्ग पर गुजरना है, जिसमें सौंदर्य, अस्मिता व मूल्यों की अभिव्यक्ति हो सके। वह साहित्य व भाषा में उतरती है तो जीवंत सांस्कृतिक विरासत होती है जो अतीत व वर्तमान के मध्य सेतु होती है।

साहित्य में समकाल व लोक संस्कृति को स्थिर न समझें, बल्कि युगानुकूल उसका स्वीकरण होता रहता है। मछली, वृक्ष, हवा, खिलौना, घर, गाय, पुष्प, पत्ते इत्यादि ऐसे आलंबन हैं जो अपने साथ हमारी स्मृति लिये रहते हैं। संरक्षण, प्रक्रिया, उपकरण, सामग्री, डिजाइन, रूपांकन- सभी में एक परंपरा है। यही साहित्य में, आज के साहित्य में भी परिलक्षित होता है। ये साहित्य की परंपरा को जीवित रखने, बहुश्रुत बनाने, संबद्ध रखने, स्मृति संपन्न रखने और रचनात्मक होने को आधार देते हैं। लोक संस्कृति से कविता में विशिष्ट गतिमयता मिल सकती है, क्योंकि स्मृति, संकेत, स्वजनता,आत्मीयता से भिन्न गतिशास्त्र बनाया जा सकता है। यह एक सापेक्षता चुनती है जो कविता की धार है। इसमें सद्भाव व स्वतंत्रता है। वैयक्तिक सम्मान, लोक कल्याण की जगह सृजनात्मकता व सहित का समाहार इसमें हैं जो समकालीन साहित्य के लिए भी अपेक्षित है।

(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद