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सबरीमाला मंदिर पुनर्विचार में आस्था और परंपरा का ध्यान रखना जरूरी है

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सबरीमाला मंदिर पुनर्विचार में आस्था और परंपरा का ध्यान रखना जरूरी है


डॉ. निवेदिता शर्मा

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2018 के सबरीमला निर्णय पर पुनर्विचार की प्रक्रिया को लेकर आज हमने यह माल लिया है कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना, उसकी आध्यात्मिक परंपराओं और आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन खोजने का एक गंभीर प्रयास है। सबरीमाला मंदिर विवाद का मूल प्रश्न महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा अवश्य है, किंतु इसकी गहराई इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह उस बिंदु को छूता है जहां भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों से चली आ रही जीवंत परंपराएं आधुनिक न्यायशास्त्र के साथ संवाद करती हैं।

इससे पूर्व 2018 में दिए गए 4:1 बहुमत के निर्णय ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी परंपरागत रोक को समाप्त कर दिया था। इसे एक वर्ग ने लैंगिक समानता की जीत के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु इस निर्णय का विरोध हुआ, यहां समझनेवाली बात यह है कि इसे लेकर पुरुषों के साथ-साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी सामने आईं, जिन्होंने इस न्यायालयीन निर्णय का विरोध किया । सभी को समझना होगा कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है। यह एक विशिष्ट आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है।

भारतीय परंपरा में देवता का स्वरूप ही उपासना की पद्धति को निर्धारित करता है। ऐसे में यदि उस स्वरूप से जुड़ी परंपराओं में परिवर्तन किया जाता है, तब वह सिर्फ सामाजिक सुधार नहीं होता है, उस देवता की अवधारणा में हस्तक्षेप के समान हो जाता है। यही कारण है कि अनेक श्रद्धालु इस मामले को समानता बनाम भेदभाव के सरल द्वंद्व के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे आस्था की अखंडता के प्रश्न के रूप में समझते हैं।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण आयाम न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका है, विशेषकर धार्मिक मामलों में। “अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं” का सिद्धांत, जो शिरूर मठ मामले में विकसित हुआ था, प्रारंभ में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए था, किंतु समय के साथ यह सिद्धांत न्यायालयों को यह निर्धारित करने का अधिकार देने लगा है कि किसी धर्म की मूलभूत प्रथाएं कौन-सी हैं। यह परिवर्तन चिंताजनक है, क्योंकि इससे न्यायपालिका उन क्षेत्रों में प्रवेश करने लगती है, जो मूलतः धर्मशास्त्रीय और आध्यात्मिक हैं।

याचिकाकर्ताओं का यह तर्क महत्वपूर्ण है कि न्यायाधीश, चाहे कितने ही विद्वान क्यों न हों, वे सदियों पुरानी परंपराओं की आध्यात्मिक गहराई का पूर्ण आकलन नहीं कर सकते। यदि न्यायालय यह तय करने लगें कि कौन-सी प्रथा आवश्यक है और कौन-सी नहीं, तो वे आस्था के निर्णायक बन जाते हैं। यह धार्मिक स्वायत्तता के सिद्धांत के विपरीत है, जोकि भारतीय संविधान की आत्मा में निहित है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक और गहरी समस्या है, पाश्चात्य कानूनी ढांचे और भारतीय सभ्यतागत वास्तविकताओं के बीच असंगति का होना। पश्चिमी विचारधारा में धर्म को प्रायः एक संगठित, केंद्रीकृत संस्था के रूप में देखा जाता है, जहां नियम स्पष्ट और संहिताबद्ध होते हैं। उनके लिए ये धर्म सिर्फ एक रिलीजन है। ऐसे में रिलीजन के अर्थ में धर्म बहुत सीमित हो जाता है, इसके विपरीत भारत में धर्म जीवन का समग्र दर्शन है, जोकि विविधता, बहुलता और संदर्भानुकूलता पर आधारित है। यहां परंपराएं स्थानीय, जीवंत और निरंतर विकसित होती रहती हैं।

ऐसी स्थिति में यदि पश्चिमी उदारवादी अवधारणाओं, जैसे कि व्यक्तिगत अधिकारों की पूर्ण प्राथमिकता को भारतीय संदर्भ में बिना समुचित अनुकूलन के लागू किया जाता है तो यह स्वाभाविक रूप से टकराव उत्पन्न करता है। सबरीमाला मंदिर का निर्णय इसी टकराव का एक उदाहरण माना जा सकता है, जहां व्यक्तिगत अधिकारों को सामूहिक आध्यात्मिक परंपराओं के ऊपर प्राथमिकता दी गई।

न्यायालय को आज यह भी ध्यान देना चाहिए कि सबरीमला आंदोलन का एक उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि इसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली है। यह तथ्य उस धारणा को चुनौती देता है कि यह संघर्ष केवल महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध था। अनेक महिलाएं स्वयं इस परंपरा के पक्ष में खड़ी हुईं, क्योंकि वे इसे भेदभाव नहीं, बल्कि एक विशेष आध्यात्मिक अनुशासन का हिस्सा मानती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में आस्था और पहचान के प्रश्न केवल अधिकारों की भाषा में नहीं समझे जा सकते हैं।

पुनर्विचार याचिकाओं में धार्मिक स्वायत्तता की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है। धार्मिक संगठनों का तर्क है कि भारतीय धर्मों को अब तक स्पष्ट कानूनी पहचान नहीं मिली है, जिसके कारण वे अपने अधिकारों की प्रभावी रक्षा नहीं कर पाते। इस स्थिति में राज्य का हस्तक्षेप बढ़ जाता है, जोकि धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चुनौती बन सकता है। इस संदर्भ में यह सुझाव भी महत्वपूर्ण है कि न्यायालयों को धार्मिक मामलों में विशेषज्ञों और धर्माचार्यों से परामर्श करना चाहिए। जैसे तकनीकी मामलों में विशेषज्ञों की राय ली जाती है, वैसे ही धर्म से जुड़े मामलों में भी संबंधित परंपराओं के ज्ञाताओं की सहभागिता आवश्यक है। यह दृष्टिकोण न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संतुलित और संवेदनशील बना सकता है।

केरल सरकार के रुख में आया परिवर्तन भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। पहले जहां उसने 2018 के निर्णय का समर्थन किया था, वहीं अब उसने यह स्वीकार किया है कि दीर्घकालिक परंपराओं पर निर्णय लेने से पहले धार्मिक विद्वानों से परामर्श आवश्यक है। यह बदलाव इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आस्था से जुड़े प्रश्न केवल कानूनी तर्कों के माध्यम से हल नहीं किए जा सकते। “संवैधानिक नैतिकता” बनाम “सामाजिक नैतिकता” का विमर्श भी इस विवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संवैधानिक नैतिकता हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय के मूल्यों की ओर उन्मुख करती है, किंतु इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए। यदि इसे इस प्रकार उपयोग किया जाए कि वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह नकार दे, तो यह एक प्रकार की न्यायिक अतिरेकता बन सकती है। वहीं, “सामाजिक नैतिकता” का हवाला देकर हर परंपरा को बिना जांच के स्वीकार करना भी उचित नहीं है।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि इन दोनों के बीच एक संतुलन स्थापित किया जाए। न्यायालय को यह समझना होगा कि भारतीय समाज में धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार है।

सबरीमाला प्रकरण में प्रस्तुत उदाहरण जैसे कुछ मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित होना या विशेष परिस्थितियों में ही अनुमति मिलना यह दर्शाते हैं कि भारतीय धार्मिक परंपराएं अत्यंत विविध और विशिष्ट हैं। इन्हें एक समान मानक से नहीं परखा जा सकता। प्रत्येक परंपरा का अपना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भ होता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी