विपक्षी एकता की कीमत
मनोज कुमार मिश्र
अपने वजूद की आखिरी लड़ाई लड़कर पंजाब की सरकार बचाने में लगी आम आदमी पार्टी (आआपा) घोषित तौर से विपक्षी गठबंधन से अलग हो गई है। उसे देश पर लगातार तीसरी बार शासन कर रही भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अधिक विपक्षी इंडी गठबंधन की अगुवाई करने वाली कांग्रेस से ज्यादा खतरा लग रहा है। कांग्रेस के समर्थक मतों के साथ आने से ही आआप पहले दिल्ली और 2022 के विधानसभा चुनाव जीत कर पंजाब की सत्ता में काबिज हो पाई है।
आजादी के बाद जिस तरह से सालों देश और ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस सत्ता में रही, ठीक वही स्थिति आज भाजपा की है। देश के 78 फीसदी हिस्से पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों का शासन है। पूरे देश में यानी कश्मीर (जम्मू-कश्मीर) से लेकर कन्याकुमारी (तमिलनाडु) तक जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल प्रभावशाली हैं, कभी उन राज्यों में कांग्रेस का ही दबदबा होता था। विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को पराजित करके सत्ता पाई और कुछ राज्यों को छोड़कर आम तौर से उन राज्यों में भाजपा सबसे बड़े दल की हैसियत में काबिज हो गई। ऐसे राज्यों में से भी तमिलनाडु, तेलंगाना के अलावा ज्यादातर में सहयोगी दलों के साथ सत्ता में काबिज होती रही है।
अब तो हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कांग्रेस के अलावा विपक्षी दलों के जनाधार वाले माने जाने वाले नेता ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, नवीन पटनायक, शरद पवार, उध्दव ठाकरे, तेजस्वी यादव और अरविंद केजरीवाल खुद अपना राज्य नहीं बचा पाए और कई नेता तो अपने दल का विभाजन नहीं रोक पाए। पंजाब चुनाव से पहले आआपा में भी लगातार टूट हो रही है। यही हालत रही तो 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा को लगातार चौथी बार सत्ता में आने से रोकने में लगे कई दल और बुरे दौर में पहुंच जाएंगे।
उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती अलग-थलग पड़ गई है, दूसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे समाजवादी पार्टी (सपा) के अखिलेश यादव की भी बड़ी परीक्षा इस चुनाव में होने वाली है। राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से बसपा या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के मजबूती से चुनाव लड़ने का लाभ भाजपा को होगा। बसपा विपक्षी गठबंधन में शामिल नहीं है और ओवैसी की पार्टी से सपा तालमेल करने को तैयार नहीं है। वास्तविकता में जो समीकरण आआपा का दिल्ली या पंजाब में है, वही उत्तर प्रदेश में सपा का है। आआपा तो वास्तविकता समझकर विपक्षी गठबंधन से अलग हो गई और सपा के नेता विपक्षी गठबंधन में रहते हुए कांग्रेस पर दाएं-बाएं से तीर चला रहे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के गठबंधन के समय वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
अगले साल देश के सात राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन सात राज्यों-पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में से पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अलावा सभी पांचों राज्यों में अभी भाजपा की सरकार है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है और दिल्ली में सत्ता जाने के बाद आआपा केवल पंजाब में सत्ता में है। भाजपा तो हर राज्य में चुनाव लड़ने और जीतने की रणनीति में लगी हुई है। एक तो हिमाचल प्रदेश वैसे ही भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है, दूसरे हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार शुरु से गिरते-पड़ते चल रही है। इसलिए आम धारणा है कि जब भी चुनाव होंगे भाजपा आसानी से चुनाव जीत जाएगी।
कुछ महीने पहले भी पांच राज्यों के विधानसभा के हुए थे। भाजपा पहले से सत्ता में काबिज असम और पुडुचेरी में जीत हासिल की। केरल में वोट औसत बढ़ने के साथ भाजपा को तीन सीटें मिली। तमिलनाडु में भी भाजपा को वोट औसत बढ़ा। कॅकरोज जनता पार्टी के जिस जेन जी आंदोलन से भाजपा की अगुवाई वाली सरकार को धराशाही करने का विपक्ष दावा कर रहा है, उसी जेन जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को इस बार भी जीत दिला कर विपक्ष के दावे की कलई खोल दी। आआपा को तो हर स्तर पर भाजपा की ताकत बढ़ने और कांग्रेस की जमीन खिसकने का अंदाजा 2024 के लोकसभा चुनाव में हो गया था। उस चुनाव में कांग्रेस का आआपा से सीटों का तालमेल था। सात में से तीन सीट कांग्रेस और चार आप लड़ी। चुनाव में सभी सातों सीटें भाजपा लगातार तीसरी बार जीती। कांग्रेस को 18.50 फीसद वोट मिले।
कांग्रेस समर्थक वोट दिल्ली में राज कर रही आआपा को समझ में आ गया कि इस तालमेल से कांग्रेस मजबूत हो जाएगी और देर-सबेरे उसे ही नुकसान पहुंचाएगी। इसलिए उसने विधानसभा चुनाव अकेले चुनाव लड़ना तय किया। चुनाव में भाजपा को जीत मिली और 27 साल दिल्ली की सत्ता में उसकी वापसी हुई। 70 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा 45.86 वोट के साथ 48 और आप को 43.57 फीसद वोट के साथ 22 सीट जीत पाई। कांग्रेस को करीब छह फीसद वोट मिले।
दिल्ली में कांग्रेस वहीं पहुंच गई जहां भाजपा और कांग्रेस के अलावा मजबूत तीसरे दल वाले राज्य में पहुंच गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अगुवाई में भाजपा ने तो गुजरात, मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सालों से सत्ता से बेदखल कर दिया है। आने वाले कई सालों में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, झारखंड उत्तराखंड, बिहार और पंजाब इत्यादि में तो उसकी सत्ता में वापसी संभव ही नहीं लग रही है। देश में राजग, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पराजित करने का सपना देखने वाले कांग्रेस के नेता राहुल गांधी दिल्ली समेत उन राज्यों में भी पार्टी को नहीं खड़ी कर पा रहे हैं, जहां सालों कांग्रेस शासन में रही है।
ईवीएम (ईलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन) के खिलाफ कांग्रेस काफी समय से अभियान चला रही है। जबकि ईवीएम से चुनाव कांग्रेस राज में ही शुरू हुआ था। इतना ही नहीं जब कांग्रेस किसी राज्य में जीतती है तब ईवीएम पर कुछ नहीं बोलती। केवल हारने पर ईवीएम मुद्दा होता है। अब चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर वोट चोरी का मनगढ़ंत आरोप लगाकर केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करने का जबरन प्रयास कर रही है। यह उसी तरह से उठाया जा रहा है जैसे लोक सभा चुनाव में संविधान खतरे में की झूठा प्रचार किया जा रहा था।
भाजपा और उसके सहयोगी दल विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे हैं और विपक्षी गठबंधन चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। यह साबित हो चुका है कि जिन राज्यों में गैर कांग्रेस और गैर भाजपा वाले दल सत्ता में आए, उनमें ज्यादातर कांग्रेस के कहे जाने वाले मतों के बल पर ही चुनाव जीते। अब गिनती के राज्य ऐसे बचे हैं जहां राजग का मुकाबला सीधे कांग्रेस से होता है। यानी अगर कांग्रेस जिस राज्य में मजबूत होगी, उस राज्य में क्षेत्रीय के दल कमजोर होंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की लोकसभा सीटें 303 से घटकर 240 हुई और कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़कर 99 हो गई। कांग्रेस की बढ़ने की कीमत क्षेत्रीय दलों को ही चुकानी होगी। वे दल कांग्रेस के ही समर्थक मतों से ताकतवर हुए। यह अहसास कई क्षेत्रीय दलों को हो रहा है। आआपा से शुरुआत हुई है। उत्तर प्रदेश के चुनाव की घोषणा तक कहीं वही राह समाजवादी पार्टी न पकड़ ले, कांग्रेस के लिए यह खतरा बना हुआ है।
(लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

