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रावण दहन की परंपरा बचा ली, संदेश भुला दिया

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रावण दहन की परंपरा बचा ली, संदेश भुला दिया


-डॉ. प्रियंका सौरभ

दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय, अहंकार पर विवेक की जीत और अनैतिकता पर सदाचार की स्थापना का प्रतीक है। हर वर्ष विजयादशमी पर रावण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। आतिशबाजी होती है, उत्सव मनाए जाते हैं और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। कुछ क्षणों के लिए वातावरण विजय के उल्लास से भर जाता है लेकिन उत्सव समाप्त होते ही एक प्रश्न फिर सामने खड़ा हो जाता है- क्या सचमुच रावण मर गया? यदि रावण का अंत हो चुका है तो समाज में अन्याय, अपराध, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न और नैतिक पतन की घटनाएँ क्यों बढ़ती दिखाई देती हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने रावण के पुतले जलाने की परंपरा तो बचा ली लेकिन उसके अंतर्निहित संदेश को भुला दिया?

आज दशहरा कई स्थानों पर धार्मिक आस्था के साथ-साथ मनोरंजन और प्रदर्शन का माध्यम भी बन गया है। विशाल पुतले, आकर्षक रोशनी, आतिशबाजी और भीड़ उत्सव की भव्यता बढ़ाते हैं। लोग तस्वीरें खिंचवाते हैं, वीडियो बनाते हैं और सोशल मीडिया पर उत्सव की झलकियाँ साझा करते हैं। यह सब उत्सव का हिस्सा हो सकता है लेकिन जब आत्ममंथन की जगह केवल प्रदर्शन ले लेता है, तब पर्व का मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। रावण दहन का वास्तविक अर्थ किसी पुतले को आग के हवाले करना नहीं बल्कि उन बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेना है, जिनके कारण व्यक्ति, परिवार और समाज का पतन होता है।

रामायण का रावण असाधारण विद्वत्ता, शक्ति और सामर्थ्य का स्वामी था। वह शिवभक्त था, शास्त्रों का ज्ञाता था और एक शक्तिशाली शासक भी था। फिर भी उसका ज्ञान उसे मर्यादा का पालन करना नहीं सिखा सका। अहंकार, सत्ता का मद और पराई स्त्री के प्रति अनुचित आसक्ति उसके पतन के प्रमुख कारण बने। रावण का चरित्र हमें बताता है कि केवल ज्ञानवान होना पर्याप्त नहीं है; ज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ जिम्मेदारी और अधिकार के साथ मर्यादा भी आवश्यक है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नैतिकता से ऊपर रख देता है, तब उसकी उपलब्धियाँ भी उसे विनाश से नहीं बचा सकतीं।

आज के रावण किसी एक चेहरे या एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे कभी सत्ता के अहंकार में दिखाई देते हैं, कभी आर्थिक शोषण में, कभी रिश्तों के भीतर छिपी हिंसा में और कभी कानून की कमजोरियों का लाभ उठाने वाली मानसिकता में। दहेज के लिए प्रताड़ित की जाती महिलाएँ, घरेलू हिंसा का सामना करती बेटियाँ, यौन अपराधों के शिकार बच्चे और भ्रष्टाचार के कारण अपने अधिकारों से वंचित नागरिक हमारे सामने एक असहज सच्चाई रखते हैं। इन परिस्थितियों में रावण केवल पौराणिक पात्र नहीं रह जाता, बल्कि वह उस सोच का प्रतीक बन जाता है जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरे मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकारों को कुचल देती है।

विडंबना यह है कि हम बुराई के प्रतीक को जलाने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं, लेकिन अपने आसपास मौजूद बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने में कई बार संकोच करते हैं। किसी महिला के साथ अन्याय हो तो लोग तमाशबीन बने रहते हैं। भ्रष्टाचार दिखाई दे तो सुविधा के लिए चुप्पी साध ली जाती है। किसी कमजोर व्यक्ति का शोषण हो तो प्रभावशाली लोगों के सामने सच बोलने से बचा जाता है। जब अन्याय के सामने हमारी चुप्पी अपराधी का साहस बढ़ाती है, तब केवल रावण के पुतले जलाने से समाज में रामराज्य की कल्पना साकार नहीं हो सकती।

समस्या यह भी है कि हम बुराई को अक्सर दूसरों में खोजते हैं, अपने भीतर नहीं। हमें दूसरे का अहंकार दिखाई देता है लेकिन अपना अहंकार स्वाभिमान लगता है। दूसरों का झूठ खटकता है लेकिन अपने हित में बोला गया झूठ व्यावहारिकता कहलाता है। दूसरे की सफलता से ईर्ष्या होती है लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को उचित ठहराने के लिए हम अनेक तर्क गढ़ लेते हैं। यही दोहरा आचरण सामाजिक और नैतिक पतन की जड़ है। जब तक आत्मनिरीक्षण की शुरुआत स्वयं से नहीं होगी, तब तक सुधार की बातें केवल भाषणों और नारों तक सीमित रहेंगी।

रावण के दस सिरों को परंपरागत रूप से अनेक बुराइयों और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। आज इन सिरों को अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, छल, कपट, अन्याय, लालच, अनियंत्रित इच्छाओं और संवेदनहीनता के रूप में समझा जा सकता है। ये प्रवृत्तियाँ केवल किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक वातावरण को प्रभावित करती हैं। जब लालच ईमानदारी पर भारी पड़ता है, जब पद का उपयोग सेवा के बजाय शोषण के लिए होता है और जब रिश्तों में प्रेम की जगह नियंत्रण तथा हिंसा ले लेते हैं, तब रावण के प्रतीकात्मक सिर फिर जीवित हो उठते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि समाज में अच्छाई समाप्त हो गई है। आज भी ईमानदारी से काम करने वाले लोग, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले नागरिक, जरूरतमंदों की सहायता करने वाले युवा और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने वाले शिक्षक, चिकित्सक तथा कर्मचारी समाज को बेहतर बना रहे हैं। आवश्यकता इन मूल्यों को मजबूत करने की है।

परिवारों में बच्चों को केवल सफलता प्राप्त करना ही नहीं बल्कि सही और गलत के बीच अंतर करना भी सिखाना होगा। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को व्यवहार से जोड़ना होगा। सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी और अपराध के मामलों में निष्पक्ष जाँच तथा समयबद्ध न्याय की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

महिलाओं की सुरक्षा, बच्चों के अधिकार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और सामाजिक न्याय जैसे विषय केवल त्योहारों पर चर्चा करने के मुद्दे नहीं हैं। इनके लिए निरंतर प्रयास, संवेदनशीलता और ठोस कार्रवाई जरूरी है। समाज को ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी जिसमें पीड़ित को दोष देने के बजाय उसका साथ दिया जाए, गलत काम करने वाले व्यक्ति के प्रभाव के बजाय उसके कृत्य को महत्व दिया जाए और कानून का सम्मान व्यक्ति की हैसियत देखकर नहीं बल्कि न्याय के सिद्धांतों के आधार पर किया जाए।

दशहरा हमें यह अवसर देता है कि हम अपने आचरण की समीक्षा करें। क्या हम अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं? क्या हम अपने लाभ के लिए किसी कमजोर व्यक्ति का नुकसान तो नहीं करते? क्या हम गलत होते देखकर भी चुप रहते हैं? क्या हमारे व्यवहार में ईमानदारी, करुणा और न्याय के लिए पर्याप्त स्थान है? इन प्रश्नों का उत्तर ही तय करेगा कि दशहरा हमारे लिए केवल एक वार्षिक उत्सव है या जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा।

रावण का पुतला हर साल जल सकता है, लेकिन बुराई का अंत तभी होगा जब उसे पोषित करने वाली मानसिकता बदलेगी। अच्छाई की विजय केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। हमें अपने भीतर के अहंकार को विनम्रता से, लालच को संतोष से, घृणा को संवेदना से और अन्याय को साहस तथा न्यायपूर्ण कार्रवाई से पराजित करना होगा।

अंततः सवाल यही है कि क्या रावण का खात्मा हो गया? उत्तर हमारे आचरण में छिपा है। यदि हम अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, ईमानदारी का पालन करते हैं और दूसरों की गरिमा का सम्मान करते हैं तो रावण की पराजय का संदेश हमारे जीवन में जीवित है। लेकिन यदि हम हर वर्ष पुतले जलाकर अपने भीतर की बुराइयों को सुरक्षित रखते हैं तो रावण दहन केवल एक दृश्य बनकर रह जाएगा। दशहरे की वास्तविक विजय उस दिन होगी, जब जलते हुए पुतलों के साथ हमारे भीतर की बुराइयाँ भी कमजोर पड़ेंगी और समाज में सत्य, न्याय, मर्यादा तथा मानवता का प्रकाश फैलेगा।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश