मुद्रा महाठगनी, इसके रूप अनेक!
प्रयाग पाण्डे
जितना पुराना मानव सभ्यता का इतिहास है, मुद्रा का भी इतिहास उतना ही पुराना है। मुद्रा का इतिहास मानव जीवन में क्रमशः आए उत्तरोत्तर परिवर्तनों की दिलचस्प कहानी है। आदिम युग से वर्तमान कम्प्यूटर युग तक मनुष्य के जीवन में हुए परिवर्तनों के साथ मुद्रा के रूपों में भी रोचक बदलाव आए हैं। अपनी विकास यात्रा में मुद्रा ने 'पशुधन' एवं 'वस्तु विनिमय प्रणाली' से डिजिटल इकोनॉमिक तक की एक लंबी यात्रा तय की है। रुपये की जितनी अजब करामात है। उतना ही गजब इतिहास भी। प्राचीनकाल में वस्तुओं का मूल्य अनाज और गाय, बैल आदि पशुओं से आंका जाता था। यह व्यवस्था भारत के अलावा ग्रीस में भी प्रचलित थी। उस काल में धनिकों के धन की माप पशुओं से की जाती थी। आज जो स्थान सोने- चांदी या रुपयों के नोट का है, प्राचीनकाल में यही स्थान पशुओं का था।
वस्तु - विनिमय (अदला-बदली) की व्यवस्था अराजक थी। इसमें आए रोज लड़ाई-झगड़े होते थे। अदला-बदली की व्यवस्था की खामियों से निपटने के लिए हजारों साल पहले सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ। प्राचीनकाल में भारत में सोना, चांदी, तांबा, पत्थर, कौड़ी आदि के सिक्के चलन में आए। वैदिक काल में सोने के सिक्के चलते थे,जिन्हें निष्क, शतनाम, सुवर्ण, पाद आदि नामों से जाना जाता था। कालांतर में चांदी के सिक्के प्रचलन में आए। चांदी के सिक्कों को पण, कार्षापण, विंशतिकी त्रिंशतिकी आदि नामों से जाना जाता था। प्राचीनकाल में जब सिक्के का आविर्भाव हुआ तब सिक्के के धातु का वजन, मूल्य और शुद्धता उसमें निहित थी। राजा इस बात का वचन देता था। सोने के सिक्के स्वयंसिद्ध मुद्रा थे। स्वयंसिद्ध मुद्रा का मूल्य उसके गर्भ में था। जबकि चांदी के सिक्के अर्ध स्वयंसिद्ध मुद्रा थे। पूर्व मध्यकाल में सोने के सिक्के को 'काशु' कहा जाता था।
प्रारंभिक सिक्कों की तौल और बनावट, दोनों निराली थी। ठीक नाप-तौल के प्रमाण स्वरूप चांदी -सोने पर कोई चिह्न बने सिक्कों को मुद्रा कहा जाता था। सिंधु घाटी सभ्यता में भी सिक्कों का प्रचलन था। ईशा पूर्व सातवीं शताब्दी के अंत तक सिक्कों का प्रचलन काफी बढ़ चुका था। भारत में गौतम बुद्ध के कार्यकाल में चांदी के सिक्कों का तौल 40 और 25 रत्ती थी। उस दौर में चांदी के सिक्कों को 'पण' और 'कर्षापण' कहा जाता था। सिक्कों में हाथी, कुत्ते या वृक्षों के ठप्पे अंकित होते थे।
प्राचीनकाल में चांदी और तांबा,सोने से कहीं अधिक मूल्यवान माने जाते थे। चूंकि सोना पृथ्वी के गर्भ में अन्य किसी धातु से अमिश्रित शुद्ध अवस्था में मिलता था। इसलिए सोना सुलभ था। माना जाता है कि संसार में सबसे पहले सिक्कों के लिए सोने को ही प्रयोग में लाया गया था। चूंकि उस दौर में चांदी दुर्लभ थी। चांदी अन्य धातुओं से मिश्रित अवस्था में मिलती थी। चांदी को खानों से निकालना मुश्किल और बेहद श्रमसाध्य था। चांदी को पहले खानों से निकाला जाता था, फिर उसे गलाकर चांदी के पात बनाए जाते थे। इसके बाद टकसालों में चांदी के रुपये ढाले जाते थे। कालांतर में ज्ञान- विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति से चांदी को खानों से निकालना सरल हो गया तो चांदी सर्वसुलभ हो गई और सोना दुर्लभ हो गया। तब दक्षिण भारत में सोने के सिक्कों की प्रधानता थी। उत्तर भारत में चांदी के सिक्कों का प्रचलन अधिक था।
दिल्ली सल्तनत के दौरान 1329 ई. में चांदी के सिक्कों के स्थान पर कांसे और तांबे के सिक्के चलाए गए। इन्हें सांकेतिक मुद्रा कहा गया। उस दौर में घर-घर टकसाल बन गए। लोग अपने घरों में खुद ही कांसे और तांबे के सिक्के ढालने लगे थे। सल्तनत को आखिरकार इन सिक्कों को बंद करना पड़ा। इनके स्थान पर सोने और चांदी के 'तंके' जारी करने पड़े। इसके बाद फिरोजशाह तुगलक (1351- 1388) ने 'शशगानी' नाम का सिक्का चलाया। ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली से प्रेरित होकर शेरशाह सूरी (1540- 1545) ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर 180 ग्रेन शुद्ध चांदी का रुपया और 380 ग्रेन शुद्ध तांबे का रुपया चलाया। रुपया संस्कृत के शब्द 'रुप्य' या 'रौप्य' का अपभ्रंश है। संस्कृत में चांदी को 'रुप्य' या 'रौप्य' कहते हैं। शेरशाह सूरी के सिक्कों में कूफी के साथ हिंदी में भी लिखा हुआ था। शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह के कार्यकाल में सिक्के का पुराना रूप कायम रहा। इस दौर के सिक्कों में भी कूफी के साथ हिंदी में लिखा जाता था लेकिन मुगल बादशाह बाबर, हुमायूं और अकबर के शासनकाल में चले सिक्कों में बादशाहों ने सिक्कों में सिर्फ कूफी में अपने नाम खुदवाए। भारत में हुमायूं ने सबसे पहले फारसी शब्दों का प्रसार किया। इसके बाद अकबर, जहांगीर, औरंगजेब आदि मुगल बादशाहों ने फारसी को खूब बढ़ावा दिया। इस कालखंड में सभी राजकार्य फारसी में ही होते थे। सिक्कों में भी फारसी अक्षरों का उपयोग किया जाता था। सिक्कों से हिंदी शब्द हटा दिए गए थे।
मुगलकाल में बाबर ने 'बाबरी' नाम से चांदी का सिक्का चलाया। अकबर ने 1577 में दिल्ली में एक शाही टकसाल बनवाई और 'मुहर' एवं 'इलाही' नाम से सोने के सिक्के चलाए। अकबर ने 'जलाली' नाम का 175 ग्रेन का चौकोर चांदी का सिक्का और 'दाम' नाम से तांबे का एक सिक्का भी चलाया, जो शेरशाह सूरी द्वारा चलाए गए चांदी के रुपये का 40 वां भाग माना जाता था। अकबर ने अपने कुछ सिक्कों में सीता और राम की मूर्ति अंकित करवाई थी और सिक्कों में देवनागरी में 'राम-सिया' लिखवाया था। जहांगीर ने 'निसार' नाम का एक सिक्का चलाया,जो रुपये के चौथाई मूल्य के बराबर था। टीपू सुल्तान ने 1787 में अपने नाम के सिक्के जारी किए। सिख साम्राज्य के राजा रणजीत सिंह (1792- 1839) ने नानक और गुरु गोविंद सिंह के नाम से सिक्के चलाए। इन सिक्कों में 'नानक सहाय' और 'गोविंद सहाय' उत्कीर्ण कराया था। दिल्ली में ईस्ट इंडिया कंपनी का आधिपत्य कायम हो जाने के बाद मुगलकालीन सिक्कों का प्रचलन बंद कर दिया गया ।
मुर्शिदाबाद के जगत सेठ को नवाब ने टकसाल चलाने के लिए अधिकृत किया था। तब भारत के अधिकांश हिस्से में जगत सेठ का रुपया चलता था। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हो जाने के बाद कंपनी ने जगत सेठ के मुद्रा चलाने के अधिकार को बदस्तूर कायम रखा। जिस दौर में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आई तब यहां चांदी और सोने के सिक्कों के मान में विविधताएं थीं। बंगाल प्रांत में एक जिले का रुपया दूसरे जिले में नहीं चलता था। अनेक जिलों में विभिन्न मान के रुपये प्रचलन में थे। सोने और चांदी में परस्पर प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। कभी सोना महंगा हो जाता था तो कभी चांदी। फर्रूखाबादी रुपये फर्रुखाबाद, बनारस, सागर और कलकत्ता के टकसालों में ढाले जाते थे। मद्रासी रुपये अलग ढलते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की टकसाल कलकत्ता में थी। यहां रुपयों की ढलाई मशीनों (कल) से होती थी। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी की टकसाल में ढले रुपयों को 'कलदार' कहा जाता था।
मुद्रा की इस विभिन्नता से लेन-देन और व्यापार में कठिनाइयां आती थीं। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा करों की वसूली के लिए नियुक्त कलक्टरों को कर और भूमि की लगान के रूप में जनता से चांदी के साठ और सोने के बहत्तर सिक्के लेने पड़ते थे। अलग- अलग वस्तुओं के लिए अलग- अलग प्रकार के सिक्के थे। अट्ठारहवीं सदी के प्रारंभ तक भारत वर्ष का अधिकांश भाग ईस्ट इंडिया कंपनी के आधिपत्य में आ चुका था। इसके तुरंत बाद कंपनी के डायरेक्टरों ने भारत में रुपयों में एकरूपता लाने की कोशिशें शुरू कर दी थी। 1806 में ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टरों ने मद्रास सरकार को पत्र लिखा कि भारत का प्रधान सिक्का चांदी का होना चाहिए, जिसका वजन एक तोला हो, जिसमें 165 ग्रेन विशुद्ध चांदी हो। डायरेक्टर सोने के सिक्कों का चलन बंद करने के पक्षधर नहीं थे।
1835 में बंगाल के गवर्नर जनरल को ब्रिटिश शासित संपूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया । 27 मई, 1835 को गवर्नर जनरल ने ईस्ट इंडिया कंपनी के आधिपत्य वाले संपूर्ण भारत में एक ही प्रकार के सिक्कों के प्रचलन की घोषणा कर दी। इस संबंध में बाकायदा मुद्रा विधान बना। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1835 में बनाए गए मुद्रा संबंधी विधान भारत की मुद्रा व्यवस्था के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इस विधान में यह व्यवस्था दी गई कि 1 सितंबर, 1835 से कंपनी के टकसालों में एक ही आकार-प्रकार के सिक्कों की ढलाई होगी। ईस्ट इंडिया कंपनी के टकसालों में ढाले जाने वाले चांदी के सिक्के को फर्रुखाबादी रुपये के बराबर माने जाने का निर्णय लिया गया। कहा गया कि चांदी के रुपये का वजन 180 ग्रेन होगा, जिसमें 165 ग्रेन विशुद्ध चांदी होगी। अठ्ठन्नी एवं चवन्नियां में भी इसी अनुपात में चांदी होगी। चांदी के सिक्के का मूल्य पन्द्रह रुपये माना गया। यह भी नियम बना कि कुछ विशेष प्रकार के सोने के सिक्के भी ढाले जाएंगे लेकिन कोई भी व्यक्ति कंपनी शासित क्षेत्र में सोने के सिक्के लेने या देने को बाध्य नहीं होगा।
ईस्ट इंडिया कंपनी के इस निर्णय के बाद भारत में हरेक प्रकार के मूल्य का मापदंड चांदी बन गई। हालांकि सोने के सिक्के का चलन जारी रहा। 1840 के दशक में कैलिफोर्निया और आस्ट्रेलिया में सोने की नई खानें खुल गईं। सोने का उत्पादन बहुत बढ़ गया। इस दशक में दुनियाभर में चांदी के मुकाबले सोने का उत्पादन डेढ़ सौ गुना अधिक हो गया था। परिणामस्वरूप चांदी के मुकाबले सोना बहुत सस्ता हो गया। जनता भूमि की लगान और अन्य कर चांदी के रुपयों के बजाय सोने की मोहरों से चुकाने लगी। आखिरकार 1 जनवरी, 1853 को मुद्रा के रूप में सोने के चलन को पूरी तरह बंद कर दिया गया।
1860 के प्रारंभिक दौर में विश्व भर में चांदी के उत्पादन में एकाएक उछाल आ गया । चांदी की भरमार हो गई। पूरा संसार चांदी-चांदी हो गया था। 1893 में सरकार ने अपनी चांदी की टकसाल बंद कर दी। इससे पहले आम लोगों को अपनी चांदी टकसाल में ले जाकर उसके सिक्के ढलवाने का अधिकार प्राप्त था। कालांतर में सरकार ने जनता का यह अधिकार छीन लिया। दिसंबर, 1893 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में यह विषय उठा। कांग्रेस ने सरकार द्वारा सर्व साधारण के लिए चांदी की टकसाल बंद करने के निर्णय की निंदा की और इसे आम जनता के हितों के विरुद्ध करार दिया।
इसके बाद प्रतीक मुद्रा का दौर प्रारंभ हुआ। प्रारंभिक दौर में करेंसी रिजर्व का संपूर्ण सोना भारत में ही रखा जाता था। 1898 में इसे अस्थायी रूप से लंदन में रखे जाने लगा। कुछ समय बाद यह व्यवस्था स्थायी हो गई। भारत का धन भारत के बजाय लंदन के काम आने लगा था। 1900 में रुपयों की ढलाई से प्राप्त मुनाफे से लंदन में स्वर्ण कोष की स्थापना कर दी गई। 1905 में नोटों की पुश्ती के लिए जो करेंसी रिजर्व था, उसमें से कुछ सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रख दिया गया। 1906 में गोल्ड स्टैंडर्ड रिजर्व की एक शाखा भारत में भी खोली गई, इसमें सोने के बजाय छह करोड़ रुपये रखने की व्यवस्था की गई। ब्रिटेन के शाही टकसाल में सोने के सिक्के और मोहरें ढाली जाती थी लेकिन भारत में इसकी अनुमति नहीं थी।
1910 में दस और पचास रुपये के नोट अखिल भारतीय कर दिए गए थे। 1911 में एक सौ रुपये का नोट भी अखिल भारतीय हो गया था। 1917 में ढाई रुपये और 1918 में एक रुपये का नोट जारी हुआ। 29 जून,1917 के बाद चांदी और सोने के सिक्कों के लेन-देन को अपराध घोषित कर दिया गया। 1931 में भारत में सोने का भाव पौने तीस रुपये प्रति तोला था। इसके बाद सोने के दाम उत्तरोत्तर बढ़ने लगे। 1929 से 1937 के बीच विश्व में सोने के उत्पादन में वृद्धि हुई। इस अवधि में विश्व में 6740 टन सोने का उत्पादन हुआ। 1931में अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भारत को अपना सोना बेचने का निर्णय लिया। भारत में सोने के खरीदार नहीं थे इसलिए भारत का सोना विदेश जाने लगा। इससे पहले भारत सोना खरीद रहा था। बीसवीं सदी के प्रारंभ से 1931 तक भारत में तकरीबन सात अरब रुपये मूल्य का सोना बाहर से आया था लेकिन 1931 से 1940 के बीच भारत को इसमें से करीब चार अरब रुपये मूल्य का सोना बाहर के मुल्कों को बेचना पड़ा था। इन नौ सालों में भारत से जितना सोना बाहर गया, उतना तैमूरलंग और नादिरशाह भी यहां से लूट कर नहीं ले गए थे।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

