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महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों का विस्तार और लोकतंत्र की कसौटी

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महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों का विस्तार और लोकतंत्र की कसौटी


डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी समावेशी भावना है। यह व्यवस्था केवल शासन चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक वादा भी है। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी इसी वादे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम रही है। इसलिए महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विचार स्वाभाविक रूप से स्वागत योग्य माना जाता है। यह केवल लैंगिक समानता का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी प्रश्न है। लेकिन महिला आरक्षण की इस ऐतिहासिक पहल के साथ एक नई बहस भी जन्म ले चुकी है। क्या महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने के लिए लोकसभा की कुल सीटों में भारी वृद्धि आवश्यक है? क्या मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही यह व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती? यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक, प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि से भी गंभीर है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों की संभावित वृद्धि दो अलग-अलग विषय हैं। महिला आरक्षण का संबंध निर्वाचित सीटों के आरक्षण से है, जबकि लोकसभा की सीटों का विस्तार भविष्य के परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जुड़ा हुआ विषय है। फिर भी आम नागरिक के मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि यदि आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना है, तो क्या इसके लिए संसद का आकार बढ़ाना अनिवार्य है? लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल अधिक सांसद होना नहीं है। लोकतंत्र की सफलता इस बात से मापी जाती है कि जन प्रतिनिधि कितने उत्तरदायी हैं, संसद में कितनी गंभीर बहस होती है, कानून कितनी गुणवत्ता से बनते हैं और जनता की समस्याओं का समाधान कितना प्रभावी ढंग से होता है। यदि केवल संख्या बढ़ाने से लोकतंत्र मजबूत होता, तो दुनिया के सबसे बड़े संसद वाले देश स्वतः सबसे बेहतर लोकतंत्र भी होते। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।

देश में आज भी लाखों लोग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, कृषि संकट और आधारभूत सुविधाओं जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में यदि संसद की संख्या बढ़ती है, तो जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे शासन अधिक प्रभावी होगा या केवल सरकारी खर्च बढ़ेगा? प्रत्येक सांसद के साथ वेतन, कार्यालय, कर्मचारी, आवास, यात्रा, सुरक्षा, संसदीय संसाधन और प्रशासनिक ढांचे का विस्तार भी जुड़ा होता है। इसलिए सीटों की संख्या बढ़ाने का निर्णय केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वित्तीय निर्णय भी है। हालांकि इस विषय पर यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि अकसर सार्वजनिक चर्चा में सांसदों के वेतन और सरकारी खर्च के बारे में कई दावे किए जाते हैं, जिनके वास्तविक आंकड़े अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी आर्थिक तर्क को प्रमाणित सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक विमर्श तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, अतिशयोक्ति पर नहीं।

महिला आरक्षण के समर्थकों का तर्क है कि बिना संवैधानिक गारंटी के राजनीतिक दल महिलाओं को पर्याप्त टिकट नहीं देंगे। पिछले सात दशकों का अनुभव भी यही बताता है कि अधिकांश दल चुनावों में महिलाओं को सीमित अवसर देते रहे हैं। इसलिए आरक्षण आवश्यक है। यह तर्क मजबूत और ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित है। दूसरी ओर एक चिंता यह भी व्यक्त की जाती है कि क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में समाज के अंतिम पायदान की महिलाओं तक पहुंचेगा? भारतीय राजनीति में चुनाव लड़ना आज भी अत्यधिक संसाधन-आधारित प्रक्रिया है। ऐसे में संभावना रहती है कि टिकट वितरण में राजनीतिक परिवारों, प्रभावशाली नेताओं, आर्थिक रूप से सक्षम उम्मीदवारों अथवा पहले से प्रसिद्ध व्यक्तियों को प्राथमिकता मिले। यदि ऐसा होता है, तो ग्रामीण, गरीब, किसान, मजदूर और मध्यमवर्गीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाएगा।

यह चुनौती केवल महिला आरक्षण की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की समग्र संरचना की है। जब तक राजनीतिक दल अपने संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं को नेतृत्व के अवसर नहीं देंगे, तब तक केवल संवैधानिक आरक्षण से अपेक्षित परिवर्तन सीमित रह सकता है। वास्तविक महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल संसद तक पहुँचाना नहीं, बल्कि निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति देना भी है। एक और महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना से जुड़ा है। लगभग सभी दल महिला सम्मान और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन टिकट वितरण, संगठनात्मक पदों और शीर्ष नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित दिखाई देती है। यदि राजनीतिक दल स्वयं अपनी कार्यप्रणाली में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएँ, तो लोकतांत्रिक संस्कृति अधिक मजबूत होगी।

लोकसभा की सीटों में संभावित वृद्धि का एक दूसरा आयाम संघीय संतुलन भी है। परिसीमन के बाद जनसंख्या के आधार पर राज्यों के प्रतिनिधित्व में परिवर्तन हो सकता है। इससे विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति का संतुलन प्रभावित होने की संभावना पर भी विशेषज्ञ चर्चा करते रहे हैं। इसलिए यह केवल संसद की संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय संघीय व्यवस्था का भी विषय है। ऐसे निर्णय व्यापक राष्ट्रीय सहमति और गंभीर विमर्श के आधार पर ही लिए जाने चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की एक और चुनौती है—जन प्रतिनिधियों के प्रति जनता का घटता विश्वास। संसद में व्यवधान, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, विधेयकों पर सीमित चर्चा और चुनावी राजनीति का बढ़ता प्रभाव लोगों के मन में यह प्रश्न पैदा करता है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी सर्वोत्तम क्षमता से काम कर रही हैं? यदि जनता पहले से ही प्रतिनिधियों की जवाबदेही पर प्रश्न उठा रही है, तो संख्या बढ़ाने से पहले जवाबदेही बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

लोकतंत्र में गुणवत्ता, संख्या से अधिक महत्वपूर्ण होती है। यदि संसद की कार्यवाही अधिक प्रभावी हो, संसदीय समितियाँ बेहतर ढंग से काम करें, सांसद अपने क्षेत्रों में अधिक सक्रिय रहें और कानून निर्माण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बने, तो जनता का विश्वास स्वतः बढ़ेगा। केवल अधिक सांसद होने से लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी नहीं हो जाता। महिला आरक्षण को लेकर एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी आवश्यक है। महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने से संसद में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, महिला सुरक्षा, बाल अधिकार, सामाजिक न्याय और परिवार से जुड़े विषयों पर अधिक संवेदनशील बहस होने की संभावना रहती है। विश्व के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीति-निर्माण में विविध दृष्टिकोण शामिल होते हैं। इसलिए महिला प्रतिनिधित्व का विस्तार लोकतंत्र के लिए लाभकारी हो सकता है।

लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक न रहे। महिलाओं को केवल चुनाव लड़ने का अवसर ही नहीं, बल्कि संसदीय समितियों, मंत्री परिषदों, नीति आयोगों और राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व में भी समान अवसर मिलें। तभी आरक्षण अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा। यदि वर्तमान 543 सीटों के भीतर 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है, तो यह विकल्प भी गंभीर चर्चा का विषय होना चाहिए। इससे महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा और अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च की आवश्यकता भी कम होगी। वहीं यदि भविष्य में परिसीमन के संवैधानिक प्रावधानों के कारण सीटों की संख्या बढ़ती है, तो उसके औचित्य, आर्थिक प्रभाव और लोकतांत्रिक लाभों पर भी सरकार को स्पष्ट और पारदर्शी संवाद करना चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति विरोध नहीं होती, बल्कि नीति निर्माण को बेहतर बनाने का माध्यम होती है। महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए भी उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। इसी प्रकार सीटों की संभावित वृद्धि का समर्थन या विरोध भी तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और सार्वजनिक हित के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आग्रहों के आधार पर। अंततः भारत को ऐसे लोकतंत्र की आवश्यकता है जहां प्रतिनिधित्व भी बढ़े, जवाबदेही भी मजबूत हो और सार्वजनिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग भी सुनिश्चित हो। महिलाओं की भागीदारी लोकतंत्र को समृद्ध बनाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि लोकतांत्रिक सुधार जनता के विश्वास, आर्थिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों को साथ लेकर आगे बढ़ें।

महिला आरक्षण का उद्देश्य अधिकार देना है, न कि केवल संख्या बढ़ाना। यदि यह उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था के भीतर अधिक प्रभावी ढंग से पूरा हो सकता है, तो उस विकल्प पर गंभीर विचार होना चाहिए। और यदि सीटों की संख्या बढ़ाना अपरिहार्य हो, तो उसके पीछे के कारण, लाभ और वित्तीय प्रभाव जनता के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ रखे जाने चाहिए। लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार जनता का विश्वास है, और यह विश्वास तभी मजबूत होता है जब निर्णय संवाद, तर्क और उत्तरदायित्व के साथ लिए जाएं।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद