नीतीश के राजनीतिक स्ट्रोक के सामने भाजपा का चक्रव्यूह
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
बिहार की राजनीति में सत्ता का हस्तांतरण जितना दिखाई देता है, उसके पीछे की राजनीतिक बिसात उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। मौजूदा घटनाक्रम को इसी नजरिए से देखें तो सवाल उठता है, क्या नीतीश कुमार ने सत्ता छोड़ी है या फिर सत्ता से दूरी बनाकर अपने अगले राजनीतिक दौर की जमीन तैयार की है? अमित शाह के नेतृत्व में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने की कोशिशों की चर्चा चुनाव से पहले ही राजनीतिक गलियारों में थी, यदि यह भाजपा की रणनीति थी तो नीतीश कुमार जैसे अनुभवी राजनेता के लिए इसका जवाब केवल सत्ता बचाना नहीं बल्कि भविष्य का राजनीतिक समीकरण तैयार करना भी हो सकता था। इसी संदर्भ में निशांत कुमार की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को देखा जा रहा है।
नीतीश कुमार लंबे समय तक निशांत की राजनीति में संभावित एंट्री को लेकर सार्वजनिक रूप से उत्साह नहीं दिखाते रहे। लेकिन दूसरी ओर निशांत की जदयू कार्यकर्ताओं के बीच मौजूदगी लगातार बढ़ती गई, यदि यह प्रक्रिया योजनाबद्ध थी तो इसका मकसद साफ हो सकता है- निशांत को पिता की घोषणा से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की मांग और संगठन की स्वीकृति से आगे बढ़ते नेता के रूप में स्थापित करना। यही रणनीति इस पूरे राजनीतिक खेल को दिलचस्प बनाती है।
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव, विकास की राजनीति और अपेक्षाकृत साफ छवि रही है। निशांत के सामने इसी विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी, यदि जदयू आने वाले समय में उन्हें नेतृत्व के चेहरे के रूप में पेश करता है तो उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वे केवल नीतीश कुमार के पुत्र के रूप में नहीं बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ सामने आयें, दूसरी तरफ सत्ता की जिम्मेदारी भाजपा के पास आने का राजनीतिक असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सरकार के प्रदर्शन को लेकर यदि जनता में असंतोष पैदा होता है तो उसका सीधा राजनीतिक भार सत्तारूढ़ भाजपा पर पड़ेगा, ऐसी स्थिति में जदयू के पास नीतीश कुमार के शासन मॉडल और भविष्य के युवा नेतृत्व को भाजपा के विकल्प के रूप में पेश करने का अवसर होगा।
यहीं, नीतीश कुमार की संभावित रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है। सत्ता से हटने के बावजूद यदि उन्होंने राजनीतिक नैरेटिव अपने पक्ष में बनाए रखा तो भाजपा सरकार के प्रदर्शन की जिम्मेदारी उठायेगी और जदयू अपने पुराने शासन की तुलना उसके साथ करेगा, यानी मुख्यमंत्री पद हाथ से जाने के बाद भी राजनीतिक लाभ की संभावना नीतीश कुमार के लिए बनी रह सकती है। फिलहाल असली मुकाबला किसी एक व्यक्ति के खिलाफ दूसरे व्यक्ति का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव का है।
भाजपा के सामने चुनौती है कि सत्ता में रहते हुए वह शासन की विश्वसनीयता बनाये रखे। जदयू के सामने चुनौती है कि वह नीतीश कुमार की विरासत को नई पीढ़ी के नेतृत्व से जोड़ सके और निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वे पारिवारिक पहचान से आगे बढ़कर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता साबित करें, अगर जदयू के भीतर निशांत को लेकर मांग मजबूत होती है और नीतीश कुमार की विरासत उनके पक्ष में राजनीतिक पूंजी बनती है तो आने वाले समय में उन्हें मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में आगे बढ़ाने की मांग तेज हो सकती है, तब आज के घटनाक्रम को महज सत्ता परिवर्तन के रूप में देखना मुश्किल होगा। सवाल यह होगा कि नीतीश कुमार ने सत्ता छोड़ी क्यों नहीं बल्कि सत्ता से हटकर भविष्य की सत्ता के लिए क्या तैयार किया? बिहार की सियासत में फिलहाल यही सबसे बड़ा सवाल है।
अमित शाह की रणनीतिक राजनीति और नीतीश कुमार के राजनीतिक अनुभव के बीच जारी यह मुकाबला अभी खत्म नहीं हुआ है। चक्रव्यूह किसने रचा और उसे किसने तोड़ा- इसका फैसला इतिहास करेगा। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीतिक बिसात पर अगली चाल अब पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाली है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

