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धर्म, अंधविश्वास और अपराधः जिम्मेदारी तय करने का समय

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धर्म, अंधविश्वास और अपराधः जिम्मेदारी तय करने का समय


-डॉ. सत्यवान सौरभ

भारतीय समाज में धर्म और आस्था की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। सदियों से लोग अपने जीवन के सुख-दुख, समस्याओं और अनिश्चितताओं के समाधान के लिए धार्मिक व्यक्तियों, गुरुओं और ज्योतिषियों की शरण में जाते रहे हैं। आस्था अपने आप में एक निजी और सम्मानजनक विषय है लेकिन जब इसी आस्था का दुरुपयोग करके अपराधों को अंजाम दिया जाता है तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे समाज का संकट बन जाता है।

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ स्वयंभू बाबा, साधु या ज्योतिषी अपने कृत्यों को “धार्मिक प्रक्रिया” या “आध्यात्मिक उपचार” का नाम देकर महिलाओं के साथ शोषण, ठगी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम देते पाए गए हैं। इन घटनाओं ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि समाज की सोच और जागरूकता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया है।

सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार का यौन शोषण या बलात्कार, चाहे किसी भी नाम या बहाने से किया जाए, जघन्य अपराध है। “धार्मिक विधि”, “उपचार” या “आध्यात्मिक क्रिया” जैसे शब्दों का प्रयोग करके ऐसे कृत्यों को सही ठहराना न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि कानून की दृष्टि में पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह एक सुनियोजित तरीका होता है, जिसके माध्यम से अपराधी अपने प्रभाव, पद और लोगों की आस्था का लाभ उठाकर उन्हें भ्रमित करता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है-क्या केवल अपराधी ही दोषी है या पीड़ित और उसका परिवार भी किसी हद तक जिम्मेदार हैं? यह सवाल समाज में अक्सर उठाया जाता है और कई बार लोग पीड़ितों पर ही उंगली उठाने लगते हैं। लेकिन यह दृष्टिकोण न केवल संवेदनहीन है बल्कि समस्या के मूल कारणों को समझने में भी बाधा बनता है।

कई मामलों में देखा गया है कि ऐसे तथाकथित धार्मिक व्यक्ति पहले लोगों का विश्वास जीतते हैं। वे खुद को चमत्कारी शक्तियों से युक्त बताते हैं, समस्याओं का त्वरित समाधान देने का दावा करते हैं और धीरे-धीरे अपने अनुयायियों पर मानसिक और भावनात्मक नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे पीड़ितों को इस हद तक प्रभावित कर देते हैं कि वे सही और गलत के बीच अंतर करने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई महिला विरोध नहीं करती तो इसे सहमति मान लेना गंभीर भूल होगी।

इसके अलावा, सामाजिक दबाव, शर्म और बदनामी का डर भी एक बड़ा कारण होता है, जिसके चलते पीड़ित खुलकर सामने नहीं आ पाते।

हमारे समाज में आज भी यौन अपराधों को लेकर पीड़ित को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति मौजूद है। ऐसे में कई महिलाएँ चुप रहना बेहतर समझती हैं। यह चुप्पी अपराधियों के लिए एक ढाल बन जाती है और वे अपने कृत्यों को बार-बार दोहराते रहते हैं।

परिवार की भूमिका को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सच है कि अगर परिवार अपने सदस्यों के प्रति अधिक सतर्क और जागरूक हो तो कुछ हद तक ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि हर व्यक्ति, विशेषकर वयस्क, अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार रखता है। कई बार ये मुलाकातें परिवार की जानकारी के बिना होती हैं और कई बार परिवार भी उसी अंधविश्वास का हिस्सा बन चुका होता है। इसलिए केवल परिवार को दोषी ठहराना भी एक सरलीकृत और अधूरा दृष्टिकोण होगा।

अब सवाल उठता है कि क्या देश में मौजूद सभी बाबा और ज्योतिषी ऐसे ही हैं? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है। हर पेशे में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब कुछ लोगों के कृत्य पूरे वर्ग की विश्वसनीयता को प्रभावित करने लगते हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि इस क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है कि क्या इन तथाकथित धार्मिक और ज्योतिषीय गतिविधियों से समाज को वास्तविक लाभ मिल रहा है या नहीं। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यदि किसी व्यवस्था में बार-बार ठगी, शोषण और अपराध के मामले सामने आते हैं तो यह संकेत है कि उस व्यवस्था में कहीं न कहीं गहरी खामी है। ऐसे में सरकार और संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि वे इस क्षेत्र का अध्ययन करें, आंकड़े एकत्र करें और यह मूल्यांकन करें कि समाज को इससे कितना लाभ और कितना नुकसान हो रहा है।

साथ ही, कानून का सख्ती से पालन भी अत्यंत आवश्यक है।

जो लोग धर्म या आस्था का सहारा लेकर अपराध करते हैं, उनके खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश देने के लिए होनी चाहिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है- चाहे वह कितना ही प्रभावशाली या पूजनीय क्यों न माना जाता हो।

लेकिन केवल कानून ही इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समाज और आम जनता की है। जब तक लोग बिना सवाल किए, बिना तर्क के किसी भी व्यक्ति पर विश्वास करते रहेंगे, तब तक ऐसे लोग पनपते रहेंगे।

शिक्षा और जागरूकता इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान हैं। लोगों को यह समझना होगा कि आस्था और अंधविश्वास में अंतर होता है। आस्था व्यक्तिगत होती है, जबकि अंधविश्वास वह होता है जिसमें व्यक्ति तर्क और विवेक को छोड़ देता है।

हमें अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक सोच और प्रश्न पूछने की आदत सिखानी होगी। यदि कोई व्यक्ति किसी “धार्मिक प्रक्रिया” के नाम पर आपसे कुछ ऐसा करने को कहता है जो असामान्य, असहज या निजी सीमा का उल्लंघन करता हो तो उस पर तुरंत सवाल उठाना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर कानून की मदद लेनी चाहिए।

मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। मीडिया को चाहिए कि वह ऐसे मामलों को जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करे, न कि सनसनीखेज तरीके से। साथ ही, समाज में जागरूकता फैलाने के लिए सकारात्मक और शिक्षाप्रद सामग्री को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

अंततः, यह सामूहिक जिम्मेदारी है। अपराधी को सजा दिलाना जरूरी है लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है ऐसे माहौल का निर्माण करना, जहाँ अपराध पनप ही न सके। इसके लिए कानून, समाज, परिवार और व्यक्ति- सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी।

धर्म का मूल उद्देश्य मानवता, नैतिकता और सदाचार को बढ़ावा देना है। यदि कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर इन मूल्यों का उल्लंघन करता है तो वह न केवल कानून का अपराधी है बल्कि धर्म का भी अपमान करता है। ऐसे लोगों को पहचानना, उनके खिलाफ आवाज उठाना और उन्हें कानून के दायरे में लाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

समय आ गया है कि हम आस्था और अंधविश्वास के बीच स्पष्ट रेखा खींचें। यह समझें कि हर वह व्यक्ति जो धार्मिक भाषा बोलता है, वह धार्मिक नहीं होता। सबसे महत्वपूर्ण- किसी भी परिस्थिति में अपराध को धर्म का नाम देकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अगर समाज इस मूलभूत सत्य को समझ ले तो न केवल ऐसे अपराधों में कमी आएगी बल्कि एक अधिक जागरूक, सुरक्षित और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना भी संभव हो सकेगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश