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धनतेरसः आरोग्य, धन और समृद्धि का पावन पर्व

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धनतेरसः आरोग्य, धन और समृद्धि का पावन पर्व


धनतेरस (6 नवंबर) पर विशेष

-योगेश कुमार गोयल

प्रतिवर्ष दीपावली से दो दिन पूर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस का पर्व श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 6 नवंबर को मनाया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में धनतेरस का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसे केवल धन और वैभव की प्राप्ति का पर्व मानना उचित नहीं होगा बल्कि यह आरोग्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने का भी अवसर है। इस दिन विशेष रूप से भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा-अर्चना की जाती है।

धनतेरस का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार तथा आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है। मान्यता है कि उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था, जो जीवन, स्वास्थ्य और अमरत्व का प्रतीक है। इसी कारण उन्हें देवताओं का वैद्य और आरोग्य का देवता कहा जाता है। समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत के माध्यम से देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ था। भगवान धन्वंतरि के इसी दिव्य प्राकट्य की स्मृति में धनतेरस मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।

भगवान धन्वंतरि का संबंध केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है बल्कि उनका आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा परंपरा में भी विशेष स्थान है। आयुर्वेद को जीवन का विज्ञान माना गया है, जिसका उद्देश्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं बल्कि शरीर और मन को स्वस्थ रखते हुए दीर्घ एवं संतुलित जीवन प्रदान करना है। यही कारण है कि धनतेरस का दिन चिकित्सकों, वैद्यों और चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों के लिए भी विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा कर लोग परिवार के आरोग्य, निरोगी काया और दीर्घायु की कामना करते हैं। धनतेरस हमें यह संदेश भी देता है कि वास्तविक धन केवल सोना, चांदी और संपत्ति नहीं बल्कि अच्छा स्वास्थ्य, मानसिक शांति और संतोषपूर्ण जीवन है। इसलिए इस पर्व का मूल भाव धन के साथ आरोग्य और समृद्धि की मंगलकामना करना है।

धनतेरस के पर्व पर भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा के साथ मृत्यु के देवता यमराज के पूजन तथा दीपदान का भी विशेष विधान है। इस दिन संध्याकाल में घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है, जिसे ‘यम दीपक’ अथवा ‘यमदीपदान’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि तथा मंगल बना रहता है। इस परंपरा के पीछे अत्यंत रोचक और भावुक पौराणिक कथा प्रचलित है।

कथा के अनुसार, एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि प्राणियों के प्राण हरते समय क्या कभी ऐसा अवसर भी आया, जब किसी व्यक्ति के प्रति तुम्हारे मन में दया उत्पन्न हुई हो और तुम्हारा हृदय करुणा से भर उठा हो? यमराज का प्रश्न सुनकर यमदूतों ने उत्तर दिया कि वे तो केवल उनकी आज्ञा का पालन करने वाले सेवक हैं। उनका कार्य निर्धारित समय पर जीवों के प्राण लेना है इसलिए दया और मोह-माया का उनके कार्य में कोई स्थान नहीं है।

हालांकि, यमराज द्वारा निर्भय होकर सच बताने का आश्वासन दिए जाने पर उन्होंने एक ऐसी घटना का उल्लेख किया, जिसने उन्हें भी भीतर तक विचलित कर दिया था।

यमदूतों ने बताया कि एक बार हंस नाम का राजा शिकार के लिए जंगल में गया था। शिकार करते समय वह अपने साथियों से बिछुड़ कर दूसरे राज्य की सीमा में पहुंच गया। उस राज्य के राजा हेमा ने अतिथि धर्म का पालन करते हुए उसका खूब आदर-सत्कार किया। संयोगवश उसी दिन राजा हेमा की पत्नी ने एक अत्यंत सुंदर पुत्र को जन्म दिया। राजपरिवार में खुशियां छा गई लेकिन ज्योतिषियों ने नवजात राजकुमार की कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा और रानी शोकाकुल हो उठे। उन्होंने अपने पुत्र को इस अनिष्ट से बचाने के लिए उसे यमुना नदी के किनारे एक निर्जन गुफा में रखवा दिया। वहां उसके पालन-पोषण की राजसी व्यवस्था की गई और विशेष सावधानी बरती गई कि उस पर किसी युवती की छाया तक न पड़े। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

एक दिन संयोगवश राजा हंस की पुत्री घूमते-घूमते यमुना तट पर पहुंच गई। वहां उसकी दृष्टि राजकुमार पर पड़ी और दोनों एक-दूसरे को देखते ही मोहित हो गए। उनके बीच प्रेम उत्पन्न हुआ और उन्होंने उसी समय गंधर्व विवाह कर लिया। दुर्भाग्यवश, ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अनुसार विवाह के चार दिन बाद ही राजकुमार की मृत्यु हो गई। यमदूतों ने यमराज को बताया कि उन्होंने अपने जीवन में उस नवविवाहित जोड़े जैसा सुंदर और प्रेमपूर्ण युगल कभी नहीं देखा था। दोनों कामदेव और रति के समान प्रतीत होते थे। राजकुमार के प्राण हरने के बाद जब उसकी नवविवाहिता पत्नी ने विलाप करना शुरू किया तो उसका करुण क्रंदन सुनकर यमदूतों का हृदय भी द्रवित हो उठा।

यह पूरा वृत्तांत सुनने के बाद यमराज ने कहा कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि के पूजन के साथ उनके निमित्त दीपदान करने से अकाल मृत्यु के भय से रक्षा होती है। तभी से धनतेरस पर यमदीपदान की परंपरा प्रचलित होने की मान्यता है। इसी विश्वास के चलते लोग संध्याकाल में घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर यमराज से परिवार के सभी सदस्यों की लंबी आयु और आरोग्य की प्रार्थना करते हैं।

धनतेरस पर खरीदारी की भी विशेष परंपरा है। इस दिन पुराने और टूटे-फूटे बर्तनों के स्थान पर नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से तांबे, पीतल और चांदी के बर्तन खरीदने की परंपरा है। अनेक लोग सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के और अन्य उपयोगी वस्तुएं भी खरीदते हैं। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में सुख, सौभाग्य और समृद्धि लेकर आती हैं। कुछ परिवारों में नई झाड़ू खरीदकर उसका पूजन करने की भी परंपरा है। झाड़ू को माता लक्ष्मी का प्रतीक मानते हुए इसे घर से दरिद्रता और नकारात्मकता दूर करने का माध्यम माना जाता है।

हालांकि, धनतेरस का वास्तविक संदेश केवल अधिक खरीदारी करना नहीं बल्कि धन के सदुपयोग, स्वच्छता, स्वास्थ्य और संतुलित जीवन का महत्व समझना है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी निरोगी शरीर, परिवार की खुशियां, मानसिक शांति और परिश्रम से अर्जित समृद्धि है। भगवान धन्वंतरि की आराधना और यमदीपदान के माध्यम से यह पर्व जीवन की रक्षा, दीर्घायु और मंगलमय भविष्य की कामना का अनुपम अवसर बन जाता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश