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ज्योतित हो जन-मन जग सारा

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ज्योतित हो जन-मन जग सारा


दीपावली के अवसर पर विशेष

गिरीश्वर मिश्र

कार्तिक का महीना पारंपरिक भारत में उत्सवों का महीना है और कृषि कार्यों की दृष्टि से भी ख़ास है। लोक प्रसिद्धि है कि कार्तिक अमावस्या को रघुकुलनायक श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी कर लंका विजय कर अयोध्या वापस लौटे थे। उनके शुभागमन के अवसर पर आयोजित दीपोत्सव की मधुर स्मृति को संजोता यह त्योहार उल्लास के साथ मनाया जाता है। दीप-मालिका की शोभा के साथ दिवाली भारत और विदेशों में जहाँ भारतवंशी हैं एक सांस्कृतिक जीवंतता का पर्व बन चुका है। इस अवसर पर घर की सफाई होती है, कूड़ा-कचरा हटाकर सजावट की जाती है। दीपावली के दिन विष्णु पत्नी देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। माता लक्ष्मी श्री, शोभा, समृद्धि और सौंदर्य- सभी की अधिष्ठात्री हैं।

दीपावली के आगे-पीछे कई त्योहार लग गए हैं और अब यह पूरा पाँच दिनों का आयोजन बन चुका है। इस क्रम में धनतेरस, नरक-चतुर्दशी (छोटी दिवाली), दीपावली (लक्ष्मी-पूजा), गोवर्धन पूजा और भैया-दूज शामिल हैं। इन अवसरों पर लोगों में बड़ा उत्साह रहता है। धनतेरस को लोग नए बर्तन से लेकर सोने-चांदी के आभूषण तक की यथाशक्ति खरीदारी करते हैं। नए वस्त्र भी पहनते हैं और घर में विशिष्ट पकवान और मिष्ठान्न भी बनते हैं। इस दिन धन-कुबेर की पूजा होती है। दीपावली के दिन घर में लक्ष्मी जी और गणेश जी का पूजन होता है और खील बताशे का प्रसाद दिया जाता है। भैयादूज में लोग परिजनों के साथ स्नेहपूर्वक मिलते-जुलते हैं। समुद्र-मंथन से देवी लक्ष्मी और धन्वंतरि का उद्भव हुआ माना जाता है। वैद्यराज धन्वंतरि का जन्मोत्सव भी दीपावली को ही मनाया जाता है। पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव-दीपावली भी मनाई जाती है। काशी में इसका ख़ास महत्व है।

दीपावली जैन तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति से भी जुड़ी है। कहते हैं इसी दिन गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्त कर कपिलवस्तु लौटे थे और उनके अनुयायियों ने दीपोत्सव मनाया था। तभी महात्मा बुद्ध ने ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात् अपना प्रकाश स्वयं बनो का उपदेश भी दिया था। यह मान्यता भी है कि सम्राट अशोक ने युद्ध छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था। सिख धर्मावलंबी इसी दिन बंदी छोड़ दिवस या मुक्ति दिवस मनाते हैं। छठे गुरु हरगोविंद सिंह जी इसी दिन जहांगीर की क़ैद से मुक्त हुए और बावन राजाओं को भी मुक्त कराया था। फिर वे स्वर्ण मंदिर हरमिंदर साहब, अमृतसर पहुंचे थे। तब वहाँ दीपावली मनाई गई थी।

काल-प्रवाह में दीपावली मनाने का रंग-रूप बदलता गया है। अब मिट्टी के दिए की जगह बिजली के नाना प्रकार के बल्बों और प्रस्तुतियों ने ले ली है। दुर्गा पूजा की ही तरह लक्ष्मी-पूजा के पंडाल भी सजने लगे हैं। अब दिए काफ़ी नहीं हैं, उनमें तेज शोर करने वाले पटाखे जुड़ गए हैं। वैभव का प्रदर्शन या कहें धन का विज्ञापन, ख़ास हो रहा है। अपनी ख़ुशी का यह इजहार वायु-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण का बड़ा कारण हो रहा है। इससे स्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ रहा है और इन पर नियंत्रण करने की कोशिश की जा रही है।

दिए के साथ अमावस की काली रात को नकारने के विनम्र संकल्प के साथ यह जन-जन का त्योहार मनुष्य की जिजीविषा को व्यक्त करता है। यह प्रकाश को गरिमा देने के साथ-साथ ख़ुद को सबके बीच स्थापित करने का भी अवसर उपलब्ध कराता है। दीन और दुनिया दोनों से जुड़ा यह पर्व एक ओर मिट्टी, किसान और कृषि कर्म से जुड़ा है तो दूसरी ओर अपने अस्तित्व के बारे में सोचने के लिए प्रश्न भी खड़ा करता है। अंधकार में कुछ सूझता नहीं है हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। दूसरी ओर प्रकाश नैसर्गिक रूप से सहज ही प्राप्त है। अनंत ऊर्जा के स्रोत सूर्य देव जीवन और जगत को मुक्तहस्त से सतत प्रकाश देते रहते हैं। उनका प्रकाश हमारे पथ को आलोकित करता है, मार्ग का निर्देश करता है और मनुष्य समेत सभी जीवों के लिए पोषण भी प्रदान करता है।

प्रकृति की दुनिया पर विचार करते हुए सांख्य दर्शन तीन गुणों की बात करता है- सत्व, रजस तथा तमस। इसकी रोचक व्याख्या भगवद्गीता में मिलती है जिसमें इस भौतिक जगत में जो कुछ भी उपस्थित है उसे इन्हीं तीनों गुणों से निर्मित बताया है। हमारे विचार, चिंतन और व्यवहार सबको तीन गुणों के संदर्भ में श्रीकृष्ण ने समझाया है। वस्तुतः तीन गुण प्रकृति की दुनिया में होने वाले क्रियाकलापों के लिए व्याकरण के तीन सूत्र सरीखे हैं। गीता के सत्रहवें और अट्ठारहवें अध्यायों में बड़े विस्तार से कर्ता, कर्म, दान, यज्ञ, ज्ञान, तप, श्रद्धा, बुद्धि, सुख, आहार आदि जीवन के सभी प्रमुख पक्षों के सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रकारों को बड़े विस्तार से समझाया गया है। इसे पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह एक पूरी जीवनशैली है।

तामसिक दृष्टि अहितकर है। जो ज्ञान केवल भौतिक शरीर को ही सम्पूर्ण मान कर चलता है, बिना युक्ति के तत्व को समझे बिना होता है वह तामसिक होता है। ऐसा कर्ता अज्ञान (मोह) से कार्य करता है। वह युक्त, मूर्ख, अहंकारी, आलसी, और दीर्घसूत्री होता है। उसकी बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है। उसे आलस और प्रमाद से सुख मिलता है।

तम यानी अंधकार डराता है और मानव सभ्यता के विकास में प्रकाश और अंधकार के बारे विचार होता आया है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में कहा गया है कि सृष्टि के आरम्भ में तम यानी अंधकार था। वह अंधकार भी अंधकार से ढँका हुआ था। यह समस्त संसार अज्ञात और जल के रूप में एक जैसा था। उस तुच्छ (शून्य या अव्यक्त) रूप से ढँका हुआ जो कुछ भी था, वह ‘एक’ परमात्मा (या मूल तत्व) तप की महिमा से प्रकट हुआ–तम आसीत्तमसा गूढ़मग्रे प्रकेतम् सलिलम् सर्वमा इदम्। तुच्छ्येनाभ्यपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिम्ना जायतैकं।

वैसे छायातप यानी धूपछाँह के साथ अँधेरे और उजाले की आँखमिचौनी भी हमेशा चलती रहती है। दोनों दो होते हुए भी इस अर्थ में परस्पर जुड़े हैं कि एक के बिना दूसरे का कोई अर्थ नहीं समझ में आता है। रात और दिन दोनों एक-दूसरे के बाद आते रहते हैं। एक का आना दूसरे के आगमन का संकेत होता है। रोशनी और पटाखे बाहर के प्रकाश को दर्शाते हैं, जो भौतिक स्तर पर अंधकार का निवारण करते हैं। पर अंदर के अंधकार यानी अंतस्तम जैसे- अज्ञान, क्रोध, अहंकार, मोह आदि का नाश भी जरूरी है। उनकी जगह, करुणा, प्रेम और सत्य की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। इन्हीं के प्रकाश से यह अंधकार दूर होगा। जो भी अंधकार या अज्ञान को दूर करता है वह प्रकाश है। शब्द में यह प्रकाश उसकी सत्यता से आता है। आचरण में प्रकाश का गुण दूसरों के हित-साधन से आता है।

प्रकाश ऊर्जा है और जड़-चेतन सारे जगत के लिए जीवन का मूल स्रोत है। जीवन व्यापार उसी के प्रताप से चलता है अब उसके साथ भी हम खेल खेल रहे हैं। तम को भी प्रच्छन्न रूप से हम प्रकाश मान लेते हैं। प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी ने देश के विभाजन के साथ हुए सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि में तमस नाम का उपन्यास लिखा था। इसमें राजनीति में मौजूद विद्वेष, हिंसा और संहार करने वाली तामसिक वृत्तियों का रेखांकन किया गया है। यह उपन्यास 1973 में प्रकाशित हुआ और फिल्मकार गोविंद निहलानी ने 1988 में इस पर एक टीवी सीरियल भी बनाया था।

औद्योगीकरण, तकनीक और शहरों की बढ़त के साथ अंधकार बाहर से हमारे अंतर्मन में समा रहा है। अब अनियंत्रित उपभोग विकास का माप हो गया है। प्रकाश से भय भी लगता है यदि मन में कोई खोट हो। आज अपरिमित विकास के मनोरथ के साथ आर्थिक समृद्धि के रथ पर सवार हमारी प्रगति की यात्रा बड़ी आकर्षक लगती है। पर वित्त से पूरी तृप्ति नहीं हो सकती। मात्र लक्ष्मी की आराधना अपर्याप्त है और लाभ शुभ होना चाहिए।

अर्थ का समाधान सबके लिए नहीं हो सकता। सस्टेनेबल विकास यानी धारणयोग्य विकास की अवधारणा के साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास की राह तय करने का निश्चय हुआ है। अनियंत्रित विकास नहीं बल्कि ऐसा विकास जो भविष्य की संभावना को जीवित रखता हो।

प्रकाश के विस्तार और प्रसार के साथ ही उसका संचालन भी होता है। प्रकाश को संजोना चाहिए। हमारे अपने ग़ैर ज़िम्मेदार आचरण से ओज़ोन की पर्त में छिद्र होने के कारण सूर्य से आने वाली अल्ट्रा वायलेट घातक किरणों को रोकने वाला सुरक्षा कवच कमजोर हो रहा है जिससे जीवन पर संकट छा रहा है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि और समुद्री जीवन को ख़तरे का अंदेशा है। मनुष्य की तामसिक वृत्ति पर लगाम न लगी तो जीवन पर संकट और गहरा होगा। उद्यम और उद्योग योग होना चाहिए न कि दुर्योग। अब सोचने का भार भी मशीन को सौंपा जा रहा है। नव उदारवादी नीति के साथ यंत्र बुद्धि (ए आई) छाती जा रही है।

हमें गंभीरता से यह विचार स्वीकार करना होगा कि सम्पूर्ण जीवन एक है। सम्पूर्ण जीवन चक्र को ध्यान में रखना होगा। न पीछे जाने की जरूरत है न आगे बढ़ने के नाम पर निरुद्देश्य भागने की। प्रकाश को अपने में तलाशना होगा।

दीप केवल बाहरी प्रकाश के लिए ही नहीं होता, वह भीतर के प्रकाश के लिए भी है। भीतर का प्रकाश सात्विक ज्ञान है। मनुष्य का प्रकाश के प्रति उत्साह उसमें देवत्व का भाव लाता है। चित्त और मन की शुचिता आवश्यक है। वित्तैषणा की जगह लोकैषणा स्थापित होनी चाहिए। मनुष्यता पर छाए नफ़रत और कट्टरता, अज्ञानता के अँधेरे दूर करने ही होंगे।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश