home page

घरेलू महिलाओं को भी आर्थिक मदद की दरकार

 | 
घरेलू महिलाओं को भी आर्थिक मदद की दरकार


डॉ. अंशुल उपाध्याय

देश में घरेलू महिलाओं को भी आर्थिक सबलता का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। वह महिलाएं जो नौकरीपेशा नहीं हैं और घर पर रहकर ही अपने बच्चों और परिवार के पोषण के लिए अपना सारा समय लगा देती हैं। उनकी व्यक्तिगत जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उनके पति द्वारा कुछ धनराशि प्रति माह प्राप्त होनी ही चाहिए। इससे न केवल महिलाओं को सबलता मिलेगी बल्कि घरेलू हिंसा के मामलों में भी कमी आएगी। भारत में लगभग घरेलू दायरे में हिंसा को घरेलू हिंसा कहा जाता है। किसी महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना, जिसके साथ महिला के पारिवारिक सम्बन्ध हैं, घरेलू हिंसा में शामिल है। घरेलू हिंसा के विरुद्ध महिला संरक्षण अधिनियम की धारा-2005 में घरेलू हिंसा को परिभाषित किया गया है।

एक गैर सरकारी संस्था के मुताबिक, भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है। इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विवाहित कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 31 प्रतिशत से 32 प्रतिशत के बीच है। 12 मई 2022 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 92 फीसद महिलाएं बिना मेहनताना लिए घरेलू काम करती हैं। कुछ महिलाएं जो पढ़ी-लिखी हैं मगर नौकरीपेशा नहीं हैं उन्हें हर वक्त ये बात कचोटती तो अवश्य होगी की काश वो भी औरों की तरह अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए ही सही कुछ रुपये कमा सकतीं।

चूंकि शिक्षा का व्यक्ति के मानसिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है। और मानसिक विकास हो जाने के बाद व्यक्ति अपना अच्छा-बुरा स्वयं समझ पाता है। ऐसे में किसी मानसिक रूप से विकसित महिला का घर पर रहना कई बार उसकी मजबूरी होती है। कई बार बच्चों के पालन हेतु तो कई बार ससुराल वालों की सहमति से। और मन में चल रहे द्वंद्व का सामना जब महिलाएं नहीं कर पातीं तो डिप्रेशन, हाई बीपी, मधुमेह जैसे रोगों का शिकार हो जाती हैं। इसलिए अगर महिलाओं को सबल बनाना है तो जरूरी नहीं परिवार के दायित्व के साथ उन्हें नौकरीपेशा होने को मजबूर किया जाए। इस समस्या का समाधान है-घरेलू महिलाओं को प्रति माह उनके पति द्वारा कुछ धनराशि का प्रदान किया जाना।

भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत से प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में जब हम भारत की महिलाओं को देखते हैं तब उनमें सशक्तिकरण केवल स्वयं रोजगार से जुड़ने पर नहीं आता अपितु उनके पास अगर कुछ मात्रा में धन रहे तो खुद ब खुद उस धन को किस तरह से अपने रोजमर्रा की आवश्यकताओं में खर्च करना है यह समझ महिलाओं में आ जाती है। देश में अधिकांश जगहों पर महिलाएं ग्रहणी है और अपना घर संभालती हैं। पर यह हमारी विडंबना है कि हमने अपने घर की महिलाओं को वित्त का अधिकार नहीं दिया ना ही वित्त संबंधी मामलों में हम घर की महिलाओं की सलाह लेते हैं। जबकि हमारी वित्तमंत्री जी स्वयं एक महिला हैं और वो भारत का बजट बनाती हैं।

दूसरी तरफ एक वह महिला है जो अपना घर चला रही है पर वह घर के बजट को सही तरीके से चला सकने में सक्षम नहीं है। हम बेटियों को पढ़ाते हैं। सब उन्हें सक्षम बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। फिर हम ये भूल जाते हैं की हमारी बेटी ही तो कल किसी और के घर की बहू बनेगी। अतः अपनी बेटी को हमेशा धन देते रहना और बहू को उससे वंचित रखना क्या ये सही है?

इसलिए देश में यह प्रावधान अवश्य ही होना चाहिए की विवाह के पश्चात यदि कोई महिला नौकरीपेशा नहीं है तो उसे उसके उसके पति से हर महीना कुछ धनराशि अवश्य प्रदान की जाए। इससे न केवल घरेलू महिलाएं अपनी जरूरत की चीजें खुद ले पाएंगी साथ ही घर की छोटी-छोटी चीजों के लिए उन्हें किसी और पर निर्भर नहीं होना होगा। यह उनके मानसिक स्वास्थ के साथ-साथ पारिवारिक शांति के लिए भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद