कॉकरोच जनता पार्टी : सियासी बुलबुला या सैलाब
राधा रमण
भारतीय लोकतंत्र में सियासी पार्टियों का बनना-बिगड़ना कोई नई बात नहीं है। हर चुनाव से पहले कुछ नई पार्टियां, कुछ नए चेहरे, कुछ नए नारे और कुछ नए झंडे सामने आते रहे हैं। उनमें से कुछ को हम गंभीरता से लेते हैं और कुछ को कोस कर भूल जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगारों से संबंधित एक टिप्पणी में ‘कॉकरोच’ शब्द से निकली सोशल मीडिया की पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) वैसी ही एक पार्टी है। हालांकि उसके संयोजक अमेरिका रिटर्न महाराष्ट्र के संभाजीनगर निवासी अभिजीत दीपके यह दावा करते हैं कि सीजेपी चुनावी राजनीति से दूर रहनेवाली एक प्रेशर ग्रुप है। लेकिन सीजेपी के पदाधिकारियों के ख्वाब बड़े हैं। नीट पेपरलीक मामले में केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा दे देने के बाद तो उनकी महत्वाकांक्षा और भी कुलांचे मारने लगी है।
मोदी सरकार के कार्यकाल में यह पहला मौका था, जब सरकार को मांगें माननी पड़ी वरना पिछले 12 वर्षों से तो लोगबाग केन्द्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की पूर्व में कही बात को ही सच मान बैठे थे कि यह अलग मिजाज की सरकार है, यहां इस्तीफा नहीं होता है। देश ने देखा कि चाहे विवाद में फंसने पर तत्कालीन राज्यमंत्री कौशल किशोर का मामला हो, बाहुबली ब्रजभूषण शरण सिंह का, अजय मिश्र टेनी का अथवा हरदीप सिंह पुरी का, विपक्ष के चौतरफा दबाव के बावजूद सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। किसी का इस्तीफा नहीं हुआ लेकिन सीजेपी के एक धरने ने सरकार को सोचने के लिए विवश कर दिया।
कॉकरोच जनता पार्टी : नाम के पीछे छुपे रहस्य
कॉकरोच नाम भले ही मजाकिया लगे पर इसके पीछे का गुस्सा और अनुभव बहुत गहरा है। कॉकरोच का स्वभाव क्या है? वह अंधेरे में रहता है, गंदगी में पनपता है, रोशनी पड़ते ही भागता है, मारो तो और तेजी से फैलता है। सबसे बड़ी बात- उसकी प्रजाति कभी खत्म नहीं होती। यही दावा अभिजीत दीपके भी करते हैं।
सीजेपी का आगाज अच्छा रहा लेकिन अंजाम दिशाहीन हो गया लगता है। शिक्षामंत्री पद से धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अभिजीत दीपके और उनकी टीम के नेता अपने को बिना चुनावी राजनीति में उलझे सुपर सरकार मानने लगे। विपक्षी पार्टियां भी मन से, बेमन से उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। कारण यह कि विपक्ष सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की हालत में नहीं रह गया। वहां कार्यकर्ता कम नेता अधिक हो गए हैं। सीजेपी को यह स्पेस अच्छा दिखा। उसके नेता देशभर के स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कई राज्यों में घूमने लगे। राजस्थान में तो पिटे भी, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में विरोध झेला। लेकिन उसके पहले झारखंड में छात्रों के आंदोलन से दूरी बना ली। पंजाब के स्कूलों की बेहतरी की बात करने लगे। इससे संदेह गहराया।
पड़ताल में पता चला कि सीजेपी के पूरे नेतृत्व का पूर्व में आम आदमी पार्टी से जुड़ाव रहा है। इससे सरकार को उन्हें घेरने का बढ़िया मौका मिल गया। उधर, गाहे बगाहे सीजेपी के लोग अदालतों के खिलाफ भी बेवजह की टिप्पणी करने लगे। इससे भी लोगों का मोहभंग हुआ।
सीजेपी के सामने चुनौतियां बेशुमार हैं।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले सवा साल से चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे लेकिन उन्हें विपक्षी दलों का भी भरपूर समर्थन नहीं मिलता था। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव भले कुछ दिन राहुल के साथ चले लेकिन बाद के दिनों में चुनाव में टिकट बांटने और प्रचार कार्य में लगे रहे। उन्हें उम्मीद थी कि वह अकेले ही सरकार बना लेंगे। यही स्थिति पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की थी। महाराष्ट्र में शरद पवार और संजय राउत सिर्फ एक्स पर बयान देकर अपना कर्तव्य निभा गए। दक्षिण और पूर्वोत्तर में भी यही हालात थे। अखबार में खबर छपने के बाद और चुनावों में बुरी तरह हार जाने के बाद विपक्ष गोलबंद हुआ। ऐसे में सीजेपी के नेताओं को लगा कि बहती गंगा में हाथ धो लें तो विपक्ष के सिरमौर हो जाएंगे।
उधर, पहले से तैयार सरकार कॉकरोचों को नेस्तनाबूद करने के लिए तैयार बैठी थी। 10 अक्टूबर को अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचते गिरफ्तार कर लिया। दूसरे दिन रिहा किया तो शांति बनाए रखने की शर्तों के साथ बेल बांड भरवाकर छोड़ा। यही कारण है कि 14 अक्टूबर को दोबारा जंतर-मंतर पर गिरफ्तार होने के बाद सौरभ दास और आशुतोष रांका को जेल से जमानत मिलने में हफ्तेभर से ज्यादा समय लग गया। सीजेपी के एक और रणनीतिकार अकिंज्य शिंदे भी शर्तों के साथ बेल बांड भरकर ही बाहर आए हैं। इससे कॉकरोच जनता पार्टी के सामने कई मुश्किलें दिख रही हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने उन्हें जेन जी मानने से इनकार कर दिया है। शर्तों के अनुसार आगे की आंदोलन के लिए उन्हें पुलिस की अनुमति लेनी होगी। पुलिस अनुमति देगी तो नए शर्तों के साथ देगी। शर्तों को तोड़ा तो फिर जेल जाना होगा। ऐसे में कानूनी बेड़ियों के साथ अब उनके लिए आंदोलन की राह और कठिन हो गई है।
इन सबके बीच बड़ा सवाल यह कि कॉकरोच जनता पार्टी की कोशिशें बुलबुला बनकर रह जाएंगी अथवा सड़कों पर अराजकता फैलाकर देश के लोकतांत्रिक स्वरूप को अस्थिरता की बाढ़ में डुबो देंगी।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

