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ऑपरेशन सर्चलाइट: 1971 का वह घाव जो आज भी न्याय की प्रतीक्षा में है

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ऑपरेशन सर्चलाइट: 1971 का वह घाव जो आज भी न्याय की प्रतीक्षा में है


ओम पराशर

25 मार्च 1971 की रात दक्षिण एशिया के इतिहास की सबसे भयावह और दर्दनाक घटनाओं में से एक की शुरुआत हुई। पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। आधिकारिक तौर पर इसे व्यवस्था बहाल करने की कार्रवाई बताया गया, लेकिन वास्तव में यह लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग कर रही बंगाली जनता की आवाज को कुचलने का एक क्रूर सैन्य अभियान बन गया।

अवामी लीग की चुनावी जीत के बाद जब बंगाल की जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग की, तो उसका जवाब गोलियों, टैंकों और बर्बर हिंसा से दिया गया। छात्रों, बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विशेष रूप से हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया। ढाका विश्वविद्यालय इस नरसंहार का प्रतीक बन गया, जहां शिक्षा के मंदिर को खून से लाल कर दिया गया।

इसके बाद जो हुआ वह केवल दमन नहीं था, बल्कि एक पूरी जातीय पहचान, सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सुनियोजित हमला था। सामूहिक हत्याएं, व्यापक उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अमानवीय यौन हिंसा ने इस त्रासदी को मानवता के इतिहास का काला अध्याय बना दिया।

बांग्लादेश के लिए 1971 केवल राजनीतिक बदलाव नहीं थाः बांग्लादेश के लिए 1971 केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरा राष्ट्रीय घाव था। हजारों परिवार टूट गए, अनगिनत महिलाओं ने अमानवीय अत्याचार झेले, गांव जला दिए गए और लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ, लेकिन वह जन्म असहनीय पीड़ा और बलिदान की कीमत पर हुआ।

आज पांच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह घाव पूरी तरह नहीं भरा है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पाकिस्तान की ओर से आज तक कोई स्पष्ट, औपचारिक और सच्ची सरकारी माफी नहीं आई है। यह केवल कूटनीतिक कमी नहीं, बल्कि एक नैतिक विफलता भी है।

जब अप्रैल 2025 में बांग्लादेश ने एक बार फिर 1971 से जुड़े मुद्दों के समाधान और औपचारिक माफी की मांग उठाई, तो वह कोई एहसान नहीं मांग रहा था। वह केवल न्याय, सत्य और ऐतिहासिक जवाबदेही की मांग कर रहा था।

इतिहास को दबाया नहीं जा सकताः आज दुनिया एक बार फिर 1971 की सच्चाई का सामना कर रही है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का प्रस्ताव 1130 जैसे प्रयास यह याद दिलाते हैं कि इतिहास को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता और न ही पीड़ा की आवाज को चुप कराया जा सकता है।

इस तरह के प्रस्ताव बांग्लादेश में हुए नरसंहार की अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। यह केवल अतीत को याद करने का प्रयास नहीं, बल्कि सत्य और न्याय को स्थापित करने की वैश्विक जिम्मेदारी भी है।

1971 का सच आज भी मान्यता की मांग कर रहा है और न्याय आज भी जवाबदेही की प्रतीक्षा में है। पांच दशक बाद भी उस नरसंहार, उत्पीड़न और विस्थापन के घाव आज भी बांग्लादेश की सामूहिक स्मृति, राजनीति और राष्ट्रीय पहचान को प्रभावित करते हैं।

कट्टरपंथ की वापसी और पुरानी आशंकाएंः इसी कारण बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों की सक्रियता आज भी चिंता का विषय बनती है। जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन, जिन्होंने 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता का विरोध किया था, आज भी अपने साथ उस इतिहास का बोझ लेकर चलते हैं। जब ऐसे संगठनों की राजनीतिक सक्रियता बढ़ती है या उनके नेताओं की पाकिस्तान के साथ नजदीकियों की खबरें सामने आती हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है। जिस देश का जन्म संघर्ष और बलिदान से हुआ हो, वहां ऐसे घटनाक्रम पुराने घावों को फिर से ताजा कर देते हैं।

भारत-बांग्लादेश संबंध: केवल कूटनीति नहीं, भावनात्मक रिश्ताः ऐसे कठिन समय में भारत की भूमिका बांग्लादेश की सामूहिक स्मृति में एक विशेष स्थान रखती है। जब-जब बांग्लादेश संकट में रहा, भारत ने समय पर सहयोग दिया, चाहे वह महामारी के दौरान वैक्सीन सहायता हो, ऑक्सीजन आपूर्ति में सहयोग, बाढ़ के समय जरूरी जानकारी साझा करना या आर्थिक दबाव के समय ईंधन उपलब्ध कराना। यह केवल कूटनीतिक सहयोग नहीं था, बल्कि सच्ची मित्रता का प्रमाण था। इन कदमों में विश्वास, संवेदनशीलता और साथ निभाने की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

कई बांग्लादेशियों के लिए भारत की यह सहायता 1971 की यादों को फिर जीवित कर देती है, जब उनके सबसे कठिन समय में भारत उनके साथ खड़ा था। जब जीवन संकट में था, घर नष्ट हो रहे थे, महिलाएं हिंसा झेल रही थीं और लाखों लोग शरणार्थी बन रहे थे, तब भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया था। इसी कारण भारत का समर्थन केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय और भावनात्मक रूप से भी याद किया जाता है। इतिहास गवाह है कि देश उन लोगों को कभी नहीं भूलते जो उनके सबसे कठिन समय में उनके साथ खड़े होते हैं।

नैतिकता की परीक्षाः बांग्लादेश का संघर्ष केवल एक देश का आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिकता की भी परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या सत्य को अनंत काल तक दबाया जा सकता है या अंततः न्याय ही विजयी होगा? 1971 का इतिहास आज भी यही संदेश देता है, सत्य को भुलाया नहीं जा सकता, न्याय को टाला जा सकता है पर रोका नहीं जा सकता, और इतिहास अंततः जवाबदेही मांगता ही है।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर