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आपातकालः लोकतंत्र के साथ विश्वासघात

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आपातकालः लोकतंत्र के साथ विश्वासघात


डॉ. आशीष वशिष्ठ

25 जून 1975 की मध्यरात्रि को लागू किया गया आपातकाल लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और संविधान की मूल भावना को कुचलने का प्रयास था। 26 जून 1975 की सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है। घबराने की कोई बात नहीं है। किंतु यह घोषणा भारतीय लोकतंत्र के लिए भयावह दौर की शुरुआत थी। सत्ता बचाने की लालसा में इंदिरा गांधी ने तानाशाही का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी स्मृतियां आज भी उस पीढ़ी को विचलित कर देती हैं।

भारत के लोकतंत्र और राजनीति के लिए यह घोर निराशा का समय था। लोकतंत्र को ठेंगे पर रख कर देश को आपातकाल की गहरी खाई में धकेलने के पीछे महज किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने की घृणित लालसा व तानाशाही मनोवृति थी। 21 महीने के आपातकाल का क्रूर समय नागरिकों पर हुए अत्याचारों की दारुण गाथा है। जहां विरोध में स्वर उठे वहां क्रूरता के साथ दमन किया गया। लोकतंत्र में आस्था रखने वाली हर आवाज को दबाया गया।

मीसा जैसे काले कानून में लगभग एक लाख लोगों को बिना किसी सुनवाई के जेलों में डाला गया। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, मुरली मनोहर जोशी, प्रकाश सिंह बादल, चौधरी चरण सिंह, राजनाथ सिंह जैसे अनेक वरिष्ठ विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों यहां तक कि छात्रों तक को जेल में बंद करा दिया। जेलों में अमानवीय यातनाएं दी गईं। बीमार होने पर दवाएं तक नहीं दी गईं। महिला बंदियों के साथ असम्मानजनक और अमानवीय व्यवहार किया गया। मीसा बंदियों को परिवार के सदस्यों से मिलने की छूट नहीं थी। रात दो बजे उनका स्थानांतरण एक से दूसरे जेल में किया जाता था, जिससे उनके समर्थन में कोई प्रदर्शन न कर सके।

इमरजेंसी के दौरान न केवल जेल में आंदोलनकारियों पर जुल्म ढाए गए, बल्कि आम लोगों को भी सरकारी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। देशभर में लाखों लोगों को बिना वजह जेल में डाल दिया गया। क्रूर यातनाएं दी गईं। नाखून, दाढ़ी के बाल उखाड़ने, सिगरेट से दागने, पंखे से उलटा लटकाने, बर्फ पर लिटाने और मूत्र पिलाने जैसे अमानवीय कृत्य किए गए। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के नेतृत्व में नसबंदी अभियान चलाया गया। आपातकाल के दो वर्षों में 1.07 करोड़ नसबंदी की गईं। कहा जाता है कि इस अभियान में अविवाहित युवकों की भी जबरन नसबंदी कर दी गई। कई राज्यों ने आवश्यक सेवाओं तक पहुंच को नसबंदी से जोड़ दिया। जिन लोगों के दो या तीन से अधिक बच्चे थे और जिन्होंने नसबंदी कराने से इनकार कर दिया, उन्हें राशन, आवास, नौकरी, स्वास्थ्य सेवा और ऋण से वंचित कर दिया गया।

आपातकाल के दौरान दिल्ली पर लिखी अपनी पुस्तक में, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल और पत्रकार अजय बोस ने लिखा है कि अधिकारियों पर नसबंदी के निर्धारित कोटे को पूरा करने का भारी दबाव था। कनिष्ठ अधिकारियों ने इस आदेश को बेरहमी से लागू किया-संविदा श्रमिकों से कहा गया, जब तक आप नसबंदी नहीं करवाते, तब तक कोई अग्रिम भुगतान नहीं, कोई नौकरी नहीं।

दिल्ली जैसे शहरी केंद्रों में बेरहमी से लगभग 120,000 झुग्गी-झोपड़ियों को ढहाने की कार्रवाई ने हज़ारों लोगों को बेघर कर दिया और जिससे अकेले दिल्ली में लगभग 700,000 लोग विस्थापित हो गए। उनके कल्याण की कोई चिंता नहीं की गई। दिल्ली के तुर्कमान गेट में झुग्गी-झोपड़ियों को ध्वस्त करने की सबसे भीषण घटनाओं में से एक हुई, जो एक मुस्लिम बहुल इलाका है, जहां पुलिस ने विध्वंस का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें कम से कम छह लोग मारे गए और हजारों लोग विस्थापित हो गए।

25 जून की रात दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग की बिजली काट दी गई। वहां कई अखबारों के दफ्तर थे। मकसद था अखबारों को छपने से रोकना. स्टेट्समैन और हिंदुस्तान टाइम्स का दफ्तर कहीं और था तो उनके अखबार निकल गए। हालांकि उन्हें बांटे जाने से रोका गया। सभी न्यूज एजेंसियों और अखबारों को कहा गया कि जो कुछ भी वह छापेंगे, उसे पहले सेंसर को दिखाना होगा। सेंसर की मंजूरी मिलने के बाद ही कोई चीज छापी या प्रसारित की जा सकती थी। अगले दिन दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स ने विरोध जताने के लिए संपादकीय पन्ने को काला कर दिया।

आपातकाल में सर्वाधिक उत्पीड़न आरएसएस व जनसंघ के कार्यकर्ताओं का किया गया। डरी हुई सरकार ने आपातकाल लगाने के पांच दिन बाद ही सरसंघचालक बालासाहब देवरस को गिरफ्तार कर लिया। जयप्रकाश नारायण ने अपनी गिरफ्तारी से पहले लोक संघर्ष समिति का नेतृत्व संघ के पूर्णकालिक नानाजी देशमुख को सौंप दिया था, बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। आरएसएस, जनसंघ, एबीवीपी और कई अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर कांग्रेस द्वारा कठोर दमन चक्र चलाया गया। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। मीसा के तहत कैद 30,000 लोगों में से 25,000 से अधिक संघ के स्वयंसेवक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीगृहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमें संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग क्षीरसागर भी थे। इसके बावजूद आरएसएस ने पूरी दृढ़ता से देश के साथ हो रहे अन्याय का पुरजोर विरोध किया।

इंदिरा गांधी केवल आपातकाल लागू कर संतुष्ट नहीं हुईं। उन्होंने इसी अवधि में 42वां संविधान संशोधन भी कराया, जिसे संविधान के इतिहास के सबसे व्यापक और विवादास्पद संशोधनों में गिना जाता है। आलोचकों ने इसे मिनी संविधान तक कहा। आपातकाल का दौर भारत के लिए एक कड़वा सबक था। यह दौर भारतीय लोकतंत्र की दृढ़ता की सबसे कठोर परीक्षा थी इसमें कई संस्थाएं पंगु बनी, वहीं कुछ ने अधिक प्रतिरोध कर संवैधानिक चेतना को जीवित रखा। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी लोकतंत्र के पुनरुत्थान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्वपूर्ण योगदान था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक द इमरजेंसी डायरीज में आपातकाल के दौरान के अनुभवों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि उस समय वे एक युवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक थे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन से जुड़े थे। उनके अनुसार, आपातकाल का दौर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के महत्व को समझने का एक बड़ा अनुभव था।

आपातकाल इतिहास की एक राजनीतिक घटना मात्र नहीं हैं, बल्कि उस दूषित मानसिकता का प्रमाण है, जो संविधान और लोकतंत्र को केवल अपनी सत्ता पाने और बचाए रखने के लिए इस्तेमाल करती है। लोकतंत्र के साथ विश्वासघात करने के बाद भी कांग्रेस ने न तो कभी माफी मांगी और न ही कोई पश्‍चाताप ही प्रकट किया। जब राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता संविधान बचाओ का भ्रामक प्रचार करें तब युवाओं को यह पता होना चाहिए कि संविधान की असली हत्या कांग्रेस ने ही की थी।

आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ के अवसर पर, भारत के इतिहास के इस काले अध्याय से मिले सबको पर विचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह काल लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा, नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के महत्व की याद दिलाता है। साथ ही, यह सत्ता के दुरुपयोग को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए निरंतर सतर्कता की आवश्यकता को रेखांकित करता है कि इस तरह की तानाशाही शासन व्यवस्था फिर कभी जड़ न जमा सके।

आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। हम ज्यादा आत्मविश्वासी, ज्यादा समृद्ध और कई मायनों में ज्यादा मजबूत लोकतंत्र हैं। लोकतांत्रिक संस्थाएं कहीं अधिक मजबूत हैं और नागरिक अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं। किंतु आपातकाल की स्मृति हमें यह चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण से जीवित रहता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। )

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश