अति पर्यटन कहीं चौपट न कर दे पर्यटन उद्योग को
प्रयाग पाण्डे
भारतीय संस्कृति में अतिथि को बहुत महत्व दिया गया है। भारत की संस्कृति का प्राचीन सिद्धांत है- अतिथि देवो भवः। इस कथन में अतिथि को देवताओं के तुल्य माना गया है। आधुनिक पर्यटन के वर्तमान दौर में अनियंत्रित, अनियोजित एवं असंयोजित अति जन पर्यटन ने भारतीय संस्कृति के इस प्राचीन सिद्धांत को अप्रासंगिक बना दिया है। पर्यटक स्थलों की क्षमता से कई गुना अधिक भीड़, घोर बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने अतिथि और आतिथ्यकर्ता के मैत्रीपूर्ण व्यवहार में खटास घोल दी है। दोनों के मध्य का सौहार्द गड़बड़ा गया है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता से अधिक पर्यटकों के आवागमन से मेहमान और मेजबान के बीच टकराव की घटनाओं में यकायक बढ़ोतरी हुई है। पहाड़ के पर्यटक स्थलों में आए दिन पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के बीच छोटी - छोटी बातों पर लड़ाई - झगड़े, गाली - गालौच, मारपीट और हाथापाई जैसी अप्रिय घटनाएं सामने आ रही हैं। अति पर्यटन के कारण उत्तराखंड के पर्यटक स्थलों में पर्यटकों से संबंधित अपराध बढ़ रहे हैं।
पर्यटन कुप्रबंधन के कारण उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों में पचाने की क्षमता नहीं रह गई है। अनियंत्रित पर्यटन ने पहाड़ के आधारभूत सुविधाओं के ढांचे को चरमरा दिया है। बड़ी संख्या में पर्यटकों के आवागमन से पहाड़ की अधिकांश मोटर सड़कें दोपहिया और चौपहिया वाहनों से पट गई हैं। लोगों को घंटों सड़क जाम की समस्या से जूझना पड़ रहा है। पहाड़ में एक घंटे के सफर में दस घंटे लग रहे हैं। गाड़ियों की भीड़ और जाम से समूचा पहाड़ त्रस्त है। स्थानीय निवासियों की दैनंदिन की गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। अति जन पर्यटन से पहाड़ में भौतिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं। वहन क्षमता से अधिक पर्यटकों के आने से मेजबान और मेहमान के बीच टकराव बढ़ा है।
उत्तराखंड में पर्यटन प्रबंध की मांग और आपूर्ति में सामंजस्य बैठाए बगैर अनियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। जबकि यहां स्थानीय संसाधनों के अनुसार सही प्रबंधन और नियोजित पर्यटन की आवश्यकता है। जब स्थानीय निवासियों के लिए चलने को सड़क - रास्ते न बचें, बुनियादी सुविधाओं का अभाव हो और स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं एवं सुविधाओं को नजरअंदाज कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए तो स्थानीय लोगों के मन में पर्यटकों के प्रति शत्रुता का भाव उत्पन्न होने की आशंका बन जाती है। पर्यटन के इस अनियोजित विकास में स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं की सरासर अनदेखी की जा रही है।
सुनियोजित पर्यटन व्यवस्था के लिए स्थानीय क्षमताओं की समझ होना जरूरी है। पर्यटकों की अति भीड़ स्थानीय लोगों के लिए भौतिक एवं सामाजिक बोझ न बने इसके लिए पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता के आधार पर पर्यटकों की संख्या को नियंत्रण में रखना आवश्यक है। अति पर्यटन से स्थानीय लोगों के मन में पर्यटकों के प्रति विद्वेष का भाव उत्पन्न हो जाता है, यह स्थिति पर्यटन उद्यम के लिए हितकर नहीं है। उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों की लोकप्रियता और उनकी व्यावसायिक उपयोगिता को बनाए रखने के लिए पर्यटकों की संख्या सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्थानीय निवासियों से मधुर संबंध और सहयोग से ही पर्यटन उद्योग को टिकाऊ और दीर्घजीवी बनाया जा सकता है। स्थानीय लोगों का सहयोग तभी मिलेगा जब पर्यटन से उनके रोजमर्रा के कामों में व्यवधान उत्पन्न न हो और उन्हें पर्यटन से आर्थिक लाभ प्राप्त हो। उत्तराखंड में पर्यटन उद्योग को दीर्घकालिक बनाना है तो अनियंत्रित पर्यटन पर प्रभावी अंकुश लगाने और पर्यटन गतिविधियों को सीधे स्थानीय लोगों की आजीविका से जोड़ने की आवश्यकता है। इसके बगैर मेजबान और मेहमान के बीच सकारात्मक एवं सौहार्दपूर्ण रिश्ते कायम नहीं हो सकते हैं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

