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संस्कृत के बिना मिट जाएगी भारतीय संस्कृति की पहचान-वेद यज्ञ में स्वामी राम स्वरूप जी का बड़ा संदेश

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संस्कृत के बिना मिट जाएगी भारतीय संस्कृति की पहचान-वेद यज्ञ में स्वामी राम स्वरूप जी का बड़ा संदेश


कठुआ, 27 अप्रैल (हि.स.)। वेद मंदिर, योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञ के अवसर पर योगाचार्य स्वामी राम स्वरूप जी ने श्रद्धालुओं को वेदों पर आधारित प्रवचन दिया। इस दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

स्वामी जी ने कहा कि वर्तमान सृष्टि का आरंभ लगभग 1,96,08,53,127 वर्ष पूर्व हुआ था और सृष्टि से पहले प्रलय की अवस्था थी जब न कोई जीव था और न ही कोई भौतिक वस्तु। उन्होंने बताया कि सृष्टि के आरंभ में कोई गुरु नहीं था, इसलिए परमात्मा स्वयं ही प्रथम गुरु के रूप में प्रकट होते हैं और वेदों का ज्ञान ऋषियों के हृदय में प्रदान करते हैं। उन्होंने ऋग्वेद और पतंजलि योगसूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि परमात्मा ही सभी गुरुओं के भी गुरु हैं। स्वामी जी के अनुसार परमात्मा द्वारा प्रकट की गई भाषा संस्कृत है जिसे “देववाणी” कहा जाता है।

यह भाषा शुद्ध, परिष्कृत और त्रुटिरहित है, जो किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं बल्कि दिव्य उत्पत्ति की भाषा है।

स्वामी राम स्वरूप जी ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की आधारशिला है जिसमें उपनिषद, छह दर्शनों, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और भगवद गीता जैसे महान ग्रंथ संरक्षित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नई पीढ़ी संस्कृत से दूर होती गई, तो भारतीय संस्कृति और पहचान पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। अंत में उन्होंने सरकार से अपील की कि देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत शिक्षा को अनिवार्य रूप से बढ़ावा दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकें।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया