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वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन की जांच के लिए दो अलग-अलग जांच समितियां गठित की गई हैं-वन मंत्री जावेद राणा

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जम्मू 27 मई (हि.स.)। जम्मू और कश्मीर के वन मंत्री जावेद राणा ने बुधवार को जम्मू शहर के बाहरी इलाकों में वन क्षेत्रों में हाल ही में चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियान से प्रभावित लोगों से मुलाकात की और कहा कि वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन की जांच के लिए दो अलग-अलग जांच समितियां गठित की गई हैं। अधिकारियों ने बताया कि पुलिस और वन विभाग की टीमों ने मंगलवार को जम्मू शहर के बाहरी इलाके में निचली शिवालिक पर्वतमाला के रायका बांदी वन क्षेत्र में एक बड़ा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जिसमें 30 से अधिक ढांचों को ध्वस्त कर कई करोड़ रुपये मूल्य की लगभग 60 कनाल वन भूमि को पुनः प्राप्त किया गया।

राणा ने कहा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के निर्देश पर जांच का आदेश दिया गया है और उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी प्रकार की ज्यादती के लिए जिम्मेदार पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राणा ने जम्मू मे पत्रकारों से कहा कि पहली बार आपके द्वारा झेली गई कठिनाइयों के संबंध में एक जांच आयोग का गठन किया गया है। इससे पहले ऐसा कोई जांच आयोग कभी गठित नहीं किया गया था।

मंत्री ने कहा कि आदिवासी मामलों के विभाग के अंतर्गत एक समिति का गठन किया गया है जो आदिवासी और वनवासियों के अधिकारों के उल्लंघन की जांच करेग जबकि वन विभाग के अंतर्गत एक अन्य जांच का आदेश दिया गया है। उन्होंने कहा कि आपके विरुद्ध अत्याचार करने वालों को कानून के कटघरे में लाया जाएगा। यदि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया तो जिम्मेदार लोगों को परिणाम भुगतने होंगे - चाहे वे कितने भी शक्तिशाली या वरिष्ठ क्यों न हों।

राणा ने कहा कि जांच से यह पता चलेगा कि वन अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन विध्वंस अभियान चलाने से पहले किया गया था या नहीं। उन्होंने कहा कि जांच इस बात की पड़ताल कर रही है कि उल्लंघन कहां हुए, इसके लिए जिम्मेदार लोग कौन हैं और यदि ये लोग वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आते हैं तो उन्हें अब तक उनके अधिकार क्यों नहीं दिए गए।

राणा ने दावा किया कि कई वरिष्ठ अधिकारियों, विभागों और लोक भवन ने शुरू में विध्वंस अभियान के बारे में अनभिज्ञता जताई थी। उन्होंने कहा कि घटना के सामने आने के बाद उन्होंने प्रशासन, वन विभाग और यहां तक कि लोक भवन से भी जानकारी मांगी थी। उन्होंने कहा कि जब मैंने अपने विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से जानकारी लेने की कोशिश की तो मुझे बताया गया कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। जब मैंने लोक भवन को फोन किया तो वहां से भी मुझे यही सूचना मिली कि उन्हें भी इसकी कोई जानकारी नहीं है।

मंत्री ने जोर देकर कहा कि आदिवासी, खानाबदोश और वनवासी वन अधिकार अधिनियम के तहत संरक्षित हैं और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता। अगर हम यह मान भी लें कि ये लोग वन भूमि पर रह रहे हैं, अगर वे आदिवासी, खानाबदोश या वनवासी हैं, तो वन अधिकार अधिनियम के तहत दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें वहां से नहीं हटा सकती।

अतिक्रमण विरोधी अभियान के समर्थन में उद्धृत अदालती आदेशों का हवाला देते हुए राणा ने कहा कि न्यायिक निर्देशों में भी वनवासियों और आदिवासी समुदायों से जुड़े मामलों में उचित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि मैंने स्वयं उन फैसलों को पढ़ा है। वे वन अधिकार अधिनियम के तहत वनवासियों के अधिकारों को मजबूत और सशक्त बनाते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई भी इन लोगों को छू नहीं सकता।

राणा ने इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने के प्रयासों के खिलाफ भी अपील की और कहा कि सभी समुदायों के लोग प्रभावित परिवारों के साथ खड़े हैं। यह हिंदू-मुस्लिम मुद्दा नहीं है। हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी आपके साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इसे सांप्रदायिक रंग देना चाहते हैं, लेकिन हम उन्हें सफल नहीं होने देंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता