गीता के श्लोक “मैं चारों वेदों में सामवेद हूँ” का वास्तविक रहस्य वेद ज्ञान से ही स्पष्ट-स्वामी राम स्वरूप जी
कठुआ, 29 मई (हि.स.)। वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 48वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को सामवेद के महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण महाराज ने भगवद्गीता के श्लोक 10/22 में स्वयं को चारों वेदों में सामवेद बताया है जिसका वास्तविक अर्थ केवल वेदों का गहन अध्ययन करने के बाद ही समझा जा सकता है।
स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि योगेश्वर श्रीकृष्ण परमेश्वर में लीन होकर परमेश्वर की ही ओर से यह कथन कर रहे हैं कि “मैं चारों वेदों में सामवेद हूँ।” यहां ‘मैं’ का अर्थ परमेश्वर से है। उन्होंने कहा कि सामवेद उपासना काण्ड है और वेदों में परमेश्वर की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। उन्होंने सामवेद के मंत्र 258, 388 तथा ऋग्वेद मंत्र 8/98/1 का उल्लेख करते हुए बताया कि इन मंत्रों में स्वयं परमेश्वर ने सामवेद को अत्यंत श्रेष्ठ बताया है और ऋषि-मुनियों को उसका गान करने का निर्देश दिया है। स्वामी राम स्वरूप जी ने कहा कि बिना वेद ज्ञान के लोग अपनी बुद्धि और कल्पना के आधार पर गीता के श्लोकों का अर्थ निकालते हैं जो कि सत्य से दूर हो सकता है। उन्होंने सांख्य शास्त्र के सूत्र “न कल्पनाविरोधः प्रमाणदृष्टटस्य” का हवाला देते हुए कहा कि जो सत्य प्रमाण से सिद्ध है, उसका खंडन केवल कल्पना से नहीं किया जा सकता।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में लोग ऋषियों की वाणी और वेदों के ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं जिसके कारण समाज सत्य से भटक रहा है। स्वामी जी ने सभी से आह्वान किया कि वे पुनः वेदों की ओर लौटें, उनका अध्ययन करें और ऋषियों द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करें। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने शतपथ ब्राह्मण के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि वेदों के ज्ञाता सदा सत्य बोलते हैं, जबकि सामान्य मनुष्य अक्सर असत्य की ओर झुक जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया

