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नटरंग ने प्रस्तुत किया ‘पियानो वादक’, कलाकारों के संघर्ष को मंच पर किया जीवंत

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नटरंग ने प्रस्तुत किया ‘पियानो वादक’, कलाकारों के संघर्ष को मंच पर किया जीवंत


जम्मू, 09 अगस्त (हि.स.)। नटरंग की ओर से रविवार थिएटर सीरीज के तहत आज नटरंग स्टूडियो थिएटर में रूसी साहित्यकार एंटोन चेखव की कहानी पर आधारित हिंदी नाट्य प्रस्तुति ‘पियानो वादक’ का मंचन किया गया। सत्येंद्र शरत द्वारा नाट्य रूपांतरित और नीरज कांत द्वारा निर्देशित इस प्रस्तुति में कलाकारों के संघर्ष, सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक असुरक्षा और सम्मान के लिए उनकी जद्दोजहद को प्रभावी ढंग से सामने रखा गया। नाटक की कहानी दो संघर्षरत कलाकारों, एक लेखक और एक पियानो वादक के इर्द-गिर्द घूमती है। प्रस्तुति के माध्यम से यह दिखाया गया कि किस प्रकार समाज कई बार प्रतिभा और कला के बजाय व्यक्ति की सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व देता है। नाटक का प्रमुख प्रसंग उस समय सामने आता है जब पियानो वादक को एक संभ्रांत समारोह में प्रस्तुति के लिए बुलाया जाता है लेकिन उसकी सामाजिक स्थिति और बाहरी रूप-रंग के कारण उसे उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ता है।

अपमानित पियानो वादक जब यह अनुभव अपने लेखक मित्र से साझा करता है तो दोनों के बीच की बातचीत कलाकारों के व्यापक संघर्ष को सामने लाती है। गरीबी, उपेक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा की कमी से जूझ रहे दोनों कलाकारों की स्थिति यह सवाल उठाती है कि अपनी कला और पहचान को बचाए रखने के लिए कलाकारों को परिस्थितियों के साथ किस हद तक समझौता करना पड़ता है। नटरंग के निदेशक पद्मश्री बलवंत ठाकुर ने कहा कि विश्व साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं को जम्मू के दर्शकों तक पहुंचाना नटरंग के प्रयासों का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि ‘पियानो वादक’ जैसे सामाजिक और मानवीय सरोकारों से जुड़े नाटक दर्शकों को मनोरंजन के साथ गंभीर विषयों पर विचार करने का अवसर देते हैं।

नाटक में कननप्रीत कौर, आर्यन शर्मा, पवन वर्मा, पलशिन दत्ता, कृषय भाटिया, वृंदा गुजराल, महिक्षित सिंह और मिहिर गुजराल ने अभिनय किया। कलाकारों ने पात्रों की भावनात्मक स्थिति, अपमान, असहायता और संघर्ष को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। प्रस्तुति की प्रकाश व्यवस्था नीरज कांत ने तैयार और संचालित की जबकि संगीत कृषय भाटिया ने दिया। पवन वर्मा ने शो का समन्वय किया और मिहिर गुजराल ने प्रस्तुतियां संभालीं। नाटक ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि समाज अक्सर प्रतिभा को वास्तविक सम्मान कब देता है और क्या सामाजिक प्रतिष्ठा कला के मूल्यांकन का आधार होनी चाहिए।

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा