भाषा खोने का मतलब है दुनिया को समझने का एक नज़रिया खो देना: उपराज्यपाल सिन्हा
श्रीनगर, 28 अक्टूबर (हि.स.)।
वैश्वीकरण के दौर में भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बुधवार को चेतावनी दी कि किसी भाषा के खत्म होने का मतलब है दुनिया को समझने का एक खास नज़रिया भी खो जाना। बेमिना में एक कार्यक्रम के दौरान उपराज्यपाल सिन्हा ने कहा कि किसी क्षेत्र को केवल भौगोलिक सीमाओं, नक्शों और आंकड़ों के ज़रिए नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए वहां की लोक परंपराओं, भाषाओं, कला रूपों, धार्मिक विरासत और वहां के लोगों के जीवन अनुभवों को जानना भी ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि यह केंद्र सांस्कृतिक विरासत, भाषा के संरक्षण, पांडुलिपियों को सहेजने, डिजिटल आर्काइविंग, भाषाई मैपिंग और अलग-अलग विषयों को मिलाकर किए जाने वाले शोध (इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च) पर ध्यान केंद्रित करेगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर बात करते हुए सिन्हा ने कहा कि तकनीकी क्षमताएं और भावनात्मक बुद्धिमत्ता (इमोशनल इंटेलिजेंस) एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। उन्होंने कहा कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता तकनीक को और अधिक उपयोगी, ज़िम्मेदार और मानवीय बना सकती है।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि छात्रों को अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन साथ ही अपनी स्वतंत्र सोच, नैतिक समझ, कल्पनाशीलता और मानवीय पहचान को भी बचाए रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भविष्य उन लोगों का होगा जो अलग-अलग विषयों को आपस में जोड़ सकें और तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं तथा पारंपरिक कारीगरों के बीच संवाद को बढ़ावा दे सकें। सिन्हा ने जलवायु परिवर्तन, पलायन और पर्यटन से जुड़ी समस्याओं जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भाषा विज्ञान, मानव विज्ञान, पारिस्थितिकी, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और कला के विशेषज्ञों के बीच आपसी सहयोग की ज़रूरत पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने भरोसा जताया कि यह केंद्र अलग-अलग विषयों को मिलाकर किए जाने वाले शोध के लिए एक मॉडल बन सकता है और अन्य संस्थानों के विद्वानों को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / बलवान सिंह

