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जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने हथियार लाइसेंस घोटाले से संबंधित जनहित याचिका में दो आईएएस अधिकारियों की याचिका खारिज की

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श्रीनगर, 06 नवंबर (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने दो आईएएस अधिकारियों की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने लंबे समय से लंबित शस्त्र लाइसेंस घोटाला जनहित याचिका में हस्तक्षेप की मांग की थी और केंद्र को निर्देश देने की मांग की थी कि उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने के प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले उनकी दलीलों पर विचार किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने पाया कि ऐसा निर्देश जारी करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि अधिकारियों की याचिका से ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना अधिकारी उचित विचार-विमर्श नहीं करेंगे। यह याचिका दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भूमि एवं भवन सचिव के पद पर तैनात 2004 बैच के एजीएमयूटी कैडर के आईएएस अधिकारी पांडुरंग कोंडबरोआ पोल और अरुणाचल प्रदेश सरकार में सचिव के पद पर तैनात 2009 बैच के एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी शाहिद इकबाल चौधरी ने दायर की थी।

अधिकारियों ने शेख मोहम्मद शफी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य के खिलाफ दायर जनहित याचिका संख्या 9/2012 में पक्षकार बनने की मांग की थी। उन्होंने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को यह निर्देश देने की भी मांग की थी कि सीबीआई द्वारा अभियोजन स्वीकृति प्रदान करने के प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले उनके अभ्यावेदनों पर विचार किया जाए।

अधिकारियों की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सकल भूषण जिनके साथ अधिवक्ता राहुल शर्मा भी थे ने तर्क दिया कि स्वतः स्वीकृत स्वीकृति के सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता और इस मामले में सक्षम अधिकारियों और न्यायालय द्वारा विशिष्ट मूल्यांकन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अधिकारी केवल अभियोजन स्वीकृति प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पहले अपने अभ्यावेदनों पर विचार करने की मांग कर रहे थे। हालांकि पीठ ने मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया।

पीठ ने टिप्पणी की कि इस न्यायालय द्वारा आवेदन स्वीकार न करने का कारण यह है कि वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा दिए गए निवेदन का सार केवल यह था कि जब तक न्यायालय निर्देश नहीं देता प्रतिवादी उचित विचार-विमर्श नहीं करेंगे जो न्यायालय को स्वीकार्य नहीं लगता। भूषण ने बाद में आवेदन वापस लेने और विभाग एवं पशु चिकित्सा विभाग के समक्ष अभ्यावेदनों पर आगे बढ़ने की अनुमति मांगी। न्यायालय ने तदनुसार आवेदन को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि अधिकारियों को कानून के तहत उपलब्ध उचित उपायों का पालन करने के लिए उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता