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नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर अभियान-एक जनआंदोलन, एक संकल्प: लेखिका पूनम झा

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नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर अभियान-एक जनआंदोलन, एक संकल्प: लेखिका पूनम झा


कठुआ, 21 मई (हि.स.)। आज के समय में नशा केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं रह गया है बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक, मानसिक और राष्ट्रीय चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ा है। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में नशे का बदलता स्वरूप चिंता का विषय बन चुका है। चिट्टा (हेरोइन) जैसे खतरनाक नशे का बढ़ता प्रचलन हमारे समाज, विशेषकर युवाओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार की ओर धकेल रहा है।

यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे परिवारों, सामाजिक संरचना और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ विषय है। आज स्थिति यह है कि नशे की चपेट में केवल युवा ही नहीं, बल्कि कम उम्र के बच्चे भी आ रहे हैं, जो समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

आधुनिक समय में नशे की तस्करी के तरीके भी बदल गए हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन के माध्यम से नशे की सप्लाई होना इस बात का संकेत है कि यह एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। हमारे पड़ोसी देश द्वारा युवाओं को इस दलदल में धकेलने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इन नापाक इरादों को कभी सफल न होने दें।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन व सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह सक्रिय है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा स्वयं जिलों का दौरा कर अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं कि नशा मुक्ति अभियान को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाया जाए। भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 2020 को शुरू किया गया “नशा मुक्त भारत अभियान” इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। हर वर्ष 26 जून को “नशा मुक्ति दिवस” मनाकर समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाता है। स्कूलों, कॉलेजों और गांव-गांव तक जागरूकता कार्यक्रम चलाकर युवाओं को सही दिशा दिखाने का कार्य किया जा रहा है। पुलिस और प्रशासन मिलकर तस्करों पर सख्त कार्रवाई कर रहे हैं, जिससे इस जहर के नेटवर्क को तोड़ा जा सके। केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, जब तक समाज और परिवार इसमें अपनी भूमिका न निभाएं। माता-पिता को अपने बच्चों की संगति, व्यवहार और दिनचर्या पर विशेष ध्यान देना होगा। सही संस्कार, खुला संवाद और मार्गदर्शन ही बच्चों को इस दलदल से दूर रख सकता है। परिवार ही वह पहली संस्था है जहाँ से जागरूकता और सुरक्षा की शुरुआत होती है।

नशा इंसान को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बना देता है। इससे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, आर्थिक स्थिति खराब होती है, परिवार टूट जाते हैं, अपराध और हिंसा बढ़ती है, सबसे दुखद पहलू यह है कि नशे का आदी व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ अपने परिवार को भी पीड़ा देता है। कितने ही घर उजड़ चुके हैं कितनी ही महिलाएँ और बच्चे आज भी इस दर्द को झेल रहे हैं। यह समझना जरूरी है कि नशा एक लत है लेकिन इसका इलाज संभव है। नशा मुक्ति केंद्र, काउंसलिंग और दवाइयों की मदद से व्यक्ति सामान्य जीवन में वापस लौट सकता है। जरूरत है केवल एक दृढ़ संकल्प की “अगर ठान लिया, तो नशे से मुक्ति संभव है।” नशे के खिलाफ यह लड़ाई केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। जब तक हम सभी मिलकर इस अभियान को जनआंदोलन नहीं बनाएंगे, तब तक इसका पूर्ण समाधान संभव नहीं।

हमें अपने स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी, नशे से दूर रहने का संदेश देना होगा, जरूरतमंद लोगों की मदद करनी होगी। आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम स्वयं भी नशे से दूर रहेंगे और अपने परिवार, समाज तथा आने वाली पीढ़ियों को भी इससे बचाएंगे। एक स्वस्थ, सुरक्षित और जागरूक जम्मू-कश्मीर का निर्माण ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

“नशा मुक्त जम्मू-कश्मीर-हम सबका सपना, हम सबकी जिम्मेदारी।”

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया