विवादित ट्रैफिक चालानों का फैसला अदालतों में कराने की मांग
जम्मू,, 10 अक्टूबर (हि.स.)।
जम्मू-कश्मीर में यातायात नियमों के उल्लंघन पर जारी होने वाले चालानों और ई-चालानों के निपटारे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अधिवक्ता रजत जम्वाल ने विवादित ट्रैफिक चालानों के मामलों में कार्यकारी अधिकारियों के बजाय सक्षम यातायात अदालतों और मजिस्ट्रेटों की भूमिका बनाए रखने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यातायात नियमों को सख्ती से लागू करना जरूरी है लेकिन किसी नागरिक द्वारा चालान को चुनौती दिए जाने की स्थिति में निष्पक्ष न्यायिक सुनवाई का अवसर भी मिलना चाहिए।
रजत जम्वाल ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय, जम्मू की यंग लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन का समर्थन करते हुए सरकार से विवादित चालानों के निपटारे की प्रस्तावित प्रशासनिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता यातायात नियमों की सख्ती, ई-चालान प्रणाली, सीसीटीवी निगरानी या सड़क सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के विरोध में नहीं हैं। उनकी आपत्ति केवल इस बात को लेकर है कि जब कोई नागरिक अपने खिलाफ लगाए गए यातायात उल्लंघन के आरोप को गलत बताता है तो उस विवाद का फैसला कौन करेगा।
रजत जम्वाल ने कहा कि चालान जारी करना और विवादित चालान पर फैसला सुनाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। यातायात पुलिस कानून के अनुसार उल्लंघन का पता लगाकर चालान जारी कर सकती है लेकिन जब कोई नागरिक आरोप से इनकार करता है और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय चाहता है तो ऐसे मामलों की सुनवाई सामान्यतः स्वतंत्र न्यायिक मंच पर होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में पहले से ही यातायात संबंधी मामलों के निपटारे के लिए विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट सहित न्यायिक व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में विवादित चालानों के मामलों में न्यायिक अधिकारियों की भूमिका को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
अधिवक्ता जम्वाल ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 167 और केंद्रीय मोटर वाहन (तीसरा संशोधन) नियम, 2026 से जुड़े बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में इनके प्रभाव और क्रियान्वयन की सावधानीपूर्वक समीक्षा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जो नागरिक यातायात उल्लंघन स्वीकार करता है, वह कानून के अनुसार जुर्माना भर सकता है या जहां अनुमति हो, वहां चालान का शमन करवा सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसने उल्लंघन किया ही नहीं तो उसे स्वतंत्र न्यायिक मंच पर अपना पक्ष रखने का सार्थक अवसर मिलना चाहिए।
रजत जम्वाल ने सीसीटीवी कैमरों, स्वचालित नंबर प्लेट पहचान प्रणाली और गति मापने वाले कैमरों से जारी चालानों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई मामलों में वाहन की सही पहचान, चालक की पहचान, उपकरणों की सटीकता और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे सामने आ सकते हैं। ऐसे मामलों में साक्ष्यों की उचित जांच और कानून के अनुसार निर्णय आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि तकनीक किसी संभावित यातायात उल्लंघन का पता लगाने में मदद कर सकती है लेकिन वह न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकती।
दिल्ली में विवादित चालानों के निपटारे की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अधिवक्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
रजत जम्वाल ने सरकार से मांग की कि वह उस अधिसूचना, आदेश या कानूनी प्रावधान को सार्वजनिक करे जिसके आधार पर कार्यकारी अधिकारियों को विवादित ट्रैफिक चालानों के निपटारे का अधिकार दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिन मामलों में नागरिक चालान को चुनौती देते हैं, उन्हें कानून के अनुसार सक्षम यातायात अदालत या मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजा जाना चाहिए ताकि लोगों को प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कई चरणों से न गुजरना पड़े।
अधिवक्ता जम्वाल ने स्पष्ट किया कि इस मांग का उद्देश्य यातायात कानूनों को कमजोर करना या वैध जुर्माने की वसूली रोकना नहीं है बल्कि न्यायिक अधिकार क्षेत्र की स्पष्टता, निष्पक्ष सुनवाई और नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।
उन्होंने जम्मू-कश्मीर सरकार से यंग लॉयर्स एसोसिएशन के ज्ञापन पर जनहित में विचार कर उचित निर्णय लेने की अपील की।
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हिन्दुस्थान समाचार / अश्वनी गुप्ता

