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पश्चिम बंगाल के तटीय जल में केंचुओं की दो नई प्रजातियों की खोज, जेडएसआई की टीम को बड़ी सफलता

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पश्चिम बंगाल के तटीय जल में केंचुओं की दो नई प्रजातियों की खोज, जेडएसआई की टीम को बड़ी सफलता


कोलकाता, 05 फ़रवरी (हि. स.)। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) की एक शोध टीम ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से पश्चिम बंगाल के तटीय जल क्षेत्र में केंचुओं (पॉलीकीट्स) की दो नई प्रजातियों की खोज की है। यह खोज राज्य के पूर्व मेदिनीपुर ज़िले के दीघा और बांकिपुट क्षेत्रों में की गई है, जिससे उत्तरी बंगाल की खाड़ी की समृद्ध लेकिन संवेदनशील समुद्री जैव-विविधता पर नई रोशनी पड़ी है।

जेडएसआई द्वारा गुरुवार को जारी बयान के अनुसार, यह अध्ययन ‘पश्चिम बंगाल, भारत, बंगाल की खाड़ी से नेरीडिडे (एनेलिडा : नेरीडिडे) की दो नई प्रजातियों का विवरण’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इसमें नई पहचानी गई इन समुद्री एनेलिड्स की विशिष्ट जैविक विशेषताओं और उनके प्राकृतिक आवास का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इनमें से पहली प्रजाति का नाम ग्रीक शब्दों सोलेनोटोस (नलिकायुक्त) और ग्नाथा (जबड़ा) से लिया गया है। इस प्रजाति की पहचान विशेष प्रकार के जबड़ों से होती है, जिनमें गूदे की गुहा से कई नलिकाएं निकलती हैं। यह केंचुआ सल्फाइड-युक्त और जैविक पदार्थों से भरपूर कीचड़ वाले इलाकों में पाया जाता है, खासकर सड़ती हुई मैंग्रोव लकड़ी और कठोर चिकनी मिट्टी के बीच।

दूसरी प्रजाति का नाम भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की पहली महिला महानिदेशक धृति बनर्जी के सम्मान में रखा गया है। यह प्रजाति रेतीले समुद्र तटों पर लकड़ी के घाटों के खंभों में पाई गई, जो ज्वार के समय पानी में डूबे रहते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, नेरीडिडे समूह के केंचुए तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पोषक तत्वों के चक्र और तलछट के वातन में अहम भूमिका निभाते हैं। अध्ययन में शामिल वैज्ञानिकों ज्योश्ना प्रधान, अनिल मोहापात्रा (जेडएसआई) और तुलियो एफ. विलालोबोस-गुरेरो (मेक्सिको स्थित सीआईसीईएसई), ने यह भी पाया कि ये नई प्रजातियां ऐसे क्षेत्रों में मिली हैं, जो मानव गतिविधियों और प्रदूषण से काफी प्रभावित हैं।

शोध दल ने कहा कि अत्यधिक अनुकूलन क्षमता वाले और प्रदूषित वातावरण में भी इन केंचुओं की मौजूदगी उनकी असाधारण सहनशीलता को दर्शाती है। साथ ही, ये प्रजातियां भविष्य में तटीय स्वास्थ्य की निगरानी के लिए जैव-संकेतक के रूप में भी उपयोगी हो सकती हैं, हालांकि इसके लिए और गहन अध्ययन की आवश्यकता होगी।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर