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एच-1बी वीजा के लिए नहीं देने होंगे एक लाख डालर, अमेरिकी न्यायालय ने ट्रम्प के आदेश को बताया गैरकानूनी

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एच-1बी वीजा के लिए नहीं देने होंगे एक लाख डालर, अमेरिकी न्यायालय ने ट्रम्प के आदेश को बताया गैरकानूनी


बोस्टन (वॉशिंगटन), 09 जून (हि.स.)। अमेरिकी संघीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एच-1बी वीज़ा आवेदन पर लगाए गए एक लाख डॉलर के शुल्क को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है। काेर्ट का यह फ़ैसला ट्रंप प्रशासन के उस अभियान के लिए एक झटका है जिसका मकसद इमिग्रेशन को सीमित करना और अमेरिकी कर्मचारियों की मांग को बढ़ाना था। इस फैसले को अमेरिकी टेक कंपनियों और हजारों भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

मैसाचुसेट्स में अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज लियो टी. सोरोकिन ने सोमवार को अपने फैसले में कहा कि एच-1बी वीज़ा पर लगाया गया एक लाख डॉलर का शुल्क वास्तव में एक टैक्स था, जिसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। अदालत ने इस आदेश को अवैध बताते हुए निरस्त कर दिया।बोस्टन में अमेरिकी जिला जज लियो सोरोकिन ने यह फ़ैसला 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरलों द्वारा दायर मुकदमे पर सुनाया । राज्यों ने ट्रंप प्रशासन द्वारा सितंबर में घोषित उस नीति को चुनौती दी थी जिसके तहत एच-1बी वीज़ा की फीस में भारी वृद्धि की गई थी।

ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क विदेशी कर्मचारियों के प्रवेश को सीमित करने के लिए एक आर्थिक दंड के रूप में लगाया गया है। हालांकि अदालत ने इसे जुर्माना नहीं बल्कि टैक्स माना और कहा कि ऐसा करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है।

उल्लेखनीय है कि एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम के तहत प्रोग्राम के तहत हर साल 65,000 वीज़ा दिए जाते हैं और इसके अलावा एडवांस्ड डिग्री वाले कर्मचारियों के लिए 20,000 वीज़ा तीन से छह साल के लिए मंज़ूर किए जाते हैं। ट्रंप के आदेश से पहले विदेशी कर्मचारी के लिए वीज़ा चाहने वाले नियोक्ता आम तौर पर अलग-अलग वजहों के आधार पर लगभग 2 हजार डालर से 5 हजार डालर तक की फ़ीस देते थे। नई नीति के तहत इसे बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दिया गया था, जिससे आवेदन संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई।

एच-1बी वीज़ा का सबसे अधिक लाभ भारतीय आईटी और तकनीकी पेशेवर उठाते हैं। इसलिए अदालत के इस फैसले को भारतीयों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अमेरिकावासी भारतीयों ने इस फैसले का स्वागत किया है। हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग, टेक कंपनियों में छंटनी और कड़े इमिग्रेशन नियमों के कारण विदेशी कर्मचारियों की भर्ती प्रभावित हुई थी। कई भारतीय पेशेवरों की नौकरियां भी चली गई थीं।

अमेरिकी नियमों के अनुसार नौकरी समाप्त होने के बाद विदेशी कर्मचारियों को नई नौकरी खोजने के लिए केवल 60 दिन का समय मिलता है। नौकरी न मिलने पर उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ता है। ऐसे में एच-1बी शुल्क को रद्द करने का अदालत का फैसला भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी टेक उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेगा। हालांकि फिलहाल के लिए अदालत के आदेश से एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम के तहत विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करने वाली कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी