home page

कैमरे की आंख से लोकजीवन, संस्कृति और इतिहास को देखने-समझने का अवसर: बीरबल शर्मा

 | 
कैमरे की आंख से लोकजीवन, संस्कृति और इतिहास को देखने-समझने का अवसर: बीरबल शर्मा


मंडी, 24 मई (हि.स.)। मंडी-500 पर व्याख्यानमाला के तहत प्रख्यात छायाकार हिमाचल गौरव बीरबल शर्मा ने कहा कि कैमरे की नजर से हिमाचल को देखन महज छायांकन ही नहीं है, अपितु यहां के लोक जीवन ,संस्कृति और इतिहास को समझने का अवसर है। दीन सहायक ट्रस्ट मंडी के चेयरमैन तेजिंद्र वैद्य सेवानिवृत्त सैशनजज की पहल पर हर महीने व्या,यायन माला आयोजित की जा रही है। जिसका उद्देश्य ऐसे लोगों को मंच प्रदान करना है जिन्होंने समाज, संस्कृति और इतिहास को अपने कार्य के माध्यम से गहराई से समझा और संरक्षित किया है।

व्याख्यानमाला की इसी कड़ी में वरिष्ठ छायाकार, लेखक और सांस्कृतिक अध्येता बीरबल शर्मा ने हिमाचल जो लैंस से देखा विषय पर अपना व्यक्तव्य प्रस्तुत किया। इस अवसर पर बीरबल शर्मा ने कहा कि कैमरे का लेंस केवल तस्वीर नहीं लेता, बल्कि समय को रोकता है। वह उन क्षणों को संरक्षित करता है जो आने वाले समय में समाज के इतिहास और स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। उनके अनुसार एक संवेदनशील छायाकार केवल दृश्य नहीं देखता, बल्कि दृश्य के भीतर छिपे जीवन, भावनाओं और सामाजिक परिवर्तनों को भी पहचानता है।

अपने लंबे फोटोग्राफी जीवन के अनुभव साझा करते हुए बीरबल शर्मा ने बताया कि उन्होंने लगभग पूरे हिमाचल प्रदेश का भ्रमण किया। उन्होंने अपने कदमों से दूरस्थ गांवों, पहाड़ी बस्तियों को नापते हुए मंदिरों, मेलों, लोक उत्सवों, प्राचीन स्थापत्य और आम जनजीवन को कैमरे की कोख में कैद किया।

उनका कहना था कि हिमाचल की असली पहचान केवल प्राकृतिक सुंदरता में नहीं, बल्कि यहां के लोगों की जीवन शैली, लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और सामुदायिक चेतना में बसती है। अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि फोटोग्राफी समाज का आईना होती है। एक तस्वीर आने वाली पीढ़ियों को यह बताती है कि किसी समय समाज कैसा था, लोग कैसे रहते थे, उनकी संस्कृति क्या थी और उनके जीवन की वास्तविक परिस्थितियां क्या थी। उन्होंने कहा कि आज तेजी से बदलते समय में कैमरे की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, क्योंकि आधुनिकता के बीच बहुत सी लोक परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

बीरबल शर्मा ने बताया कि जब वे किसी गांव, मंदिर या मेले की तस्वीर लेते थे तो उनका उद्देश्य केवल सुंदर दृश्य प्रस्तुत करना नहीं होता था। बल्कि उस स्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना को सामने लाना होता था। उन्होंने कहा कि कैमरे का लेंस समाज के उन पहलुओं को भी उजागर करता है जिन्हें सामान्य दृष्टि अक्सर अनदेखा कर देती है।

उन्होंने पत्रकारिता और फोटोग्राफी के पुराने दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय संसाधन सीमित थे। कई बार कठिन पहाड़ी रास्तों से होकर घटनास्थल तक पहुँचना पड़ता था। समाचार और तस्वीरें समय पर तैयार कर उन्हें अपने संपादक तक पहुंचाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता था। संचार साधनों के अभाव में भी फोटोग्राफर और पत्रकार पूरी जिम्मेदारी के साथ समाज की वास्तविक तस्वीर लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करते थे। उनके अनुसार फोटोग्राफी का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज को उसकी वास्तविक पहचान से परिचित कराना है। यदि कैमरा संवेदनशील हाथों में हो तो वह केवल कला का माध्यम नहीं रहता, बल्कि इतिहास, संस्कृति और जनचेतना का दस्तावेज बन जाता है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा