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सरगुजा में मिलीं 200 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, हीराकुंड विस्थापन से जुड़ा है उड़ीसा का यह ऐतिहासिक खजाना

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सरगुजा में मिलीं 200 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, हीराकुंड विस्थापन से जुड़ा है उड़ीसा का यह ऐतिहासिक खजाना


अंबिकापुर, 24 मई (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम रजपुरी में सदियों पुराना ऐतिहासिक खजाना सामने आया है। यहां के ग्रामीण लेखनकर प्रधान के घर से ताड़पत्रों पर लिखी गईं चार अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं। इन पांडुलिपियों की ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए सर्वेक्षण दल ने इनका निरीक्षण किया और तकनीकी सहायक मुजफ्फर हुसैन द्वारा इन्हें डिजिटल रूप से सुरक्षित करने के लिए जियोटैग कर लिया गया है। यह पूरी कार्रवाई सरगुजा कलेक्टर एवं ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के जिला समिति अध्यक्ष अजीत वसंत के मार्गदर्शन तथा जिला पंचायत सीईओ विनय अग्रवाल के निर्देशन में चलाए जा रहे संरक्षण अभियान के तहत पूरी की गई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, रजपुरी गांव के प्रधान परिवार के पास ताड़पत्रों के चार बंडल सुरक्षित मिले हैं। विशेषज्ञों के शुरुआती अनुमान के मुताबिक ये पांडुलिपियां लगभग वर्ष 1800 के आसपास की यानी करीब सवा दो सौ साल पुरानी हो सकती हैं। इन दुर्लभ ताड़पत्रों में सनातन संस्कृति और साहित्य से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं, जिनमें मुख्य रूप से गौ शास्त्र, भागवत पुराण, इन्द्रजीत कथा (रामायण) तथा रामरत्न गीता का वर्णन है। इस मूल्यवान विरासत को लेखनकर प्रधान के परिवार ने कई पीढ़ियों से बहुत सहेजकर और सुरक्षित रूप से अपने पास रखा था।

इन पांडुलिपियों के सरगुजा पहुंचने का इतिहास भी बेहद दिलचस्प और विस्थापन के दर्द से जुड़ा हुआ है। सर्वेक्षण के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 1955 के आसपास उड़ीसा में हीराकुंड बांध के निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहां से विस्थापित हुए थे। माना जा रहा है कि इसी विस्थापन के दौरान उड़ीसा से आए लोग इस अनमोल साहित्यिक धरोहर को अपने साथ सरगुजा क्षेत्र में लेकर आए थे। यही वजह है कि सरगुजा जिले में अब तक मिले प्राचीन साहित्यों में सर्वाधिक उड़िया साहित्य ताड़पत्रों पर ही प्राप्त हुआ है। क्षेत्र में पांडुलिपियां होने की भनक लगते ही सर्वेयर शिक्षक सुशील मिश्र और जनपद कार्यालय के तकनीकी सहायक मुजफ्फर हुसैन ने इस संरक्षक परिवार से संपर्क कर इस ऐतिहासिक धरोहर को दुनिया के सामने लाने में सफलता हासिल की।

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हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह