गंगा दशहरा : मां गंगा के अवतरण का महापर्व, स्नान-दान और पूजा से मिलता है मोक्ष का आशीर्वाद
-उदय कुमार सिंह
भारत की सनातन संस्कृति में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत पवित्र, आध्यात्मिक और पुण्यदायी माना जाता है। यह पर्व हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में गंगा दशहरा का पावन पर्व 25 मई, सोमवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन मां गंगा का स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य, जप, तप और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना गया है।
भारतीय संस्कृति में गंगा केवल नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, श्रद्धा और जीवन का आधार हैं। सनातन धर्म में गंगा को “मां गंगा”, “मोक्षदायिनी” और “पापनाशिनी” कहा गया है। मान्यता है कि गंगा जल में स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि गंगा दशहरा के अवसर पर देशभर के गंगाघाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
गंगा दशहरा : तिथि और शुभ मुहूर्त• गंगा दशहरा : 25 मई 2026, सोमवार• दशमी तिथि प्रारंभ : 25 मई 2026 को सुबह 04:30 बजे• दशमी तिथि समाप्त : 26 मई 2026 को सुबह 05:10 बजे
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ मास में अधिक मास का विशेष संयोग बन रहा है। ऐसे में गंगा स्नान, दान-पुण्य और पूजा-पाठ का महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस दिन किए गए पुण्य कार्यों का फल विशेष रूप से शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।
क्यों कहा जाता है ‘गंगा दशहरा’‘गंगा दशहरा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘दश’ यानी दस और ‘हरा’ यानी नाश करना। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। शास्त्रों में इन पापों को तीन प्रकारों में बांटा गया है-• 3 कायिक पाप- शरीर से किए गए पाप• 4 वाचिक पाप- वाणी से किए गए पाप• 3 मानसिक पाप- मन और विचारों से किए गए पाप
इसी कारण इस दिन गंगा स्नान, ध्यान, जप, तप और दान का विशेष महत्व माना गया है। कहा जाता है कि गंगा दशहरा के दिन श्रद्धा से मां गंगा की पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन के दुख, कष्ट और नकारात्मकता दूर होती है।
मां गंगा के अवतरण की पौराणिक कथापौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार और आत्मा की शांति के लिए राजा भागीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी कठिन साधना से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने मां गंगा को पृथ्वी पर आने का वरदान दिया। लेकिन मां गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसके प्रवाह को सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने पृथ्वी की रक्षा के लिए मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और उनके वेग को नियंत्रित किया। इसके बाद मां गंगा शांत रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं और राजा भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया। इसी कारण गंगा को ‘भागीरथी’ नाम से भी जाना जाता है।
राजा भागीरथ की कठोर तपस्या और गंगा अवतरण की यह कथा भारतीय संस्कृति में तप, त्याग और लोक कल्याण का प्रतीक मानी जाती है। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची निष्ठा, धैर्य और तपस्या से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
भारतीय संस्कृति और आस्था में गंगा का स्थानभारतीय सनातन संस्कृति में गंगा केवल जलधारा नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना और जीवनशक्ति का प्रतीक हैं। ऋषि-मुनियों से लेकर सामान्य जन तक, हर व्यक्ति गंगा को मां के रूप में पूजता है। गंगा के तटों पर सदियों से सभ्यता, संस्कृति, धर्म और ज्ञान का विकास हुआ है।
गंगा मनुष्य के जीवन, संस्कार और आस्था से गहराई से जुड़ी हुई हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक हिंदू धर्म के अधिकांश संस्कारों में गंगाजल का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि गंगा जल अमृत के समान पवित्र होता है और इसकी एक बूंद भी आत्मा को शुद्ध करने की क्षमता रखती है।
धार्मिक मान्यता यह भी है कि गंगा स्नान से मनुष्य के पापों और संतापों का नाश होता है तथा उसे मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसलिए गंगा दशहरा पर श्रद्धालु गंगा तटों पर स्नान कर मां गंगा का पूजन करते हैं।
गंगा दशहरा पर क्या करेंगंगा दशहरा के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें, अन्यथा घर में स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। इसके बाद मां गंगा की पूजा कर दीप, धूप, पुष्प, दूध और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।
इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल, फल, छाता, सत्तू और शीतल पेय का दान करते हैं। इसके अलावा गंगा स्तोत्र, गंगा चालीसा और मंत्रों का जाप भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन पीपल, तुलसी और अन्य पवित्र वृक्षों की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु गंगा तट पर दीपदान कर मां गंगा से सुख, समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
गंगा दशहरा का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेशगंगा दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि मानव जीवन को शुद्धता, सेवा, करुणा और सदाचार का संदेश देने वाला उत्सव है। मां गंगा हमें यह प्रेरणा देती हैं कि जीवन में निरंतर प्रवाह, पवित्रता और परोपकार बना रहना चाहिए।
आज के समय में गंगा केवल आस्था का विषय नहीं बल्कि पर्यावरण और जीवन संरक्षण का भी आधार हैं। गंगा और अन्य नदियों की स्वच्छता बनाए रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। गंगा दशहरा का पर्व हमें यह संदेश भी देता है कि जिस नदी को हम मां का दर्जा देते हैं, उसकी स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखना हमारा कर्तव्य है।
धार्मिक मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन श्रद्धा से व्रत, स्नान और पूजा करने पर व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। मां गंगा की कृपा से अष्ट सिद्धियों और नव निधियों की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यही कारण है कि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए यह पर्व आस्था, भक्ति और आत्मिक शुद्धि का महापर्व माना जाता है।------------
हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह

