आख़िर परीक्षाओं के प्रति हम कब गंभीर होंगे ?
-गिरीश्वर मिश्र
राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षाओं की छीछालेदर देखते हुए यह सवाल उठाना बेहद जरूरी हो गया है कि सरकार कब इस विषय पर गंभीर होगी और कुछ निर्णायक कदम उठाएगी। ऐसी परीक्षाओं की साख बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। बार-बार नीट जैसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में गड़बड़ी होना अक्षम्य है। पिछली बार की गड़बड़ी से सबक न लेते हुए एनटीए ने इस बार की परीक्षा की बलि ले ली और लाखों छात्रों को मुश्किल में डाल दिया। पहले की तरह सरकार की ओर से जांच-पड़ताल की कार्रवाई की सूचना जारी हो चुकी है। संसद की स्थायी समिति ने भी काम शुरू कर दिया है। समिति के सदस्य माननीय सांसद एनटीए से ‘पेपर लीक’ की परिभाषा पूछने और जानने में लगे हुए हैं।
अखबारी खबर के अनुसार एनटीए का कहना है कि “गेस पेपर” यानी अनुमानित प्रश्न को “पेपर लीक” नहीं कहा जा सकता इसलिए जो भी हुआ वह पेपर लीक ही नहीं है। बात कानूनी अर्थ लगाने की है। अब यदि कोई अभ्यर्थी या अध्यापक या फिर कोचिंग संस्थान प्रश्नपत्र का सटीक अनुमान लगा ले तो क्या किया जा सकता है? मेधावी लोग कुछ भी कर सकते हैं। स्थिति हास्यास्पद हो रही है क्योंकि सभी अपने-अपने दायित्व को मुस्तैदी से निभाने की ज़िम्मेदारी निभाते दिखने की भारी-भरकम कवायद में जुटे हुए हैं। यह अद्भुत दृश्य उपस्थित है : वे यही कह रहे हैं कि जो है या जो हुआ वह स्वाभाविक है यानी वही हो ही सकता था ! परीक्षा की नई तारीख़ मुक़र्रर कर दी गई है। भगवान करे वह परीक्षा बिना किसी विवाद के हो जाय और युवा वर्ग को अपने जीवन के पथ पर चलने का एक अवसर मिले।
गौरतलब है कि अन्य परीक्षाओं में भी धांधली की अनेक घटनाएँ सामने आती रही हैं और अनुचित साधनों का इस्तेमाल कर फ़ायदा उठाने के मसले भी पकड़ में आते रहे हैं। अक्सर इन मामलों में समय पर कार्रवाई नहीं होती या फिर कार्रवाई ही नहीं होती। जो भी हो अक्सर अपराधी दण्डित नहीं हो पाते। दूसरी तरफ़ बहुत से निरपराधियों को बेगुनाह होते हुए भी नाहक ही अच्छा-खासा नुक़सान उठाना पड़ता है। व्यवस्था अपनी जगह चलती रहती है। सच कहा जाय तो यह समस्या सुविधा और शार्टकट के सहारे सस्ते में लाभ कमाने की व्यापक होती जा रही संस्कृति का ही हिस्सा है। पैसा कमाने की चाह जाने कितने तरह के अनैतिक , भ्रष्ट और आपराधिक किस्म के ग़लत कामों को प्रोत्साहन देती है।
कुछ दिनों पहले नीट मामले में यह खबर भी आई थी कि कुछ अध्यापक जिन्हें एनटीए ने योग्य माना और परीक्षा के गोपनीय कार्य में लगाया उन्होंने फ़ौरी अर्थ लाभ पाने की आशा से परीक्षा के प्रश्न पत्र के साथ छेड़खानी की और पेपर लीक हो गया था। उन अध्यापकों को गिरफ्तार भी किया गया था। इस समस्या का एक नया आयाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के उपयोग सें भी जुड़ गया है। इंटरनेट की सुविधाएं , सर्च इंजिन और सर्वर आदि की समस्या के कारण परीक्षा से जुड़े कामों में बाधा उत्पन्न होती है। सीबीएसई के ताजा मामले में कुछ यही हुआ है जिसे अब आईआईटी की तकनीकी सहायता से दूर किया जा रहा है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि शिक्षण और परीक्षण के बीच अब दो फाँक हो चुकी है। पढ़ने वाला, पढ़ाने वाला और पढ़ाई की पड़ताल करने वाला और जीविका देने वाला धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होते गए हैं। उनका आपस में एक-दूसरे पर कोई भरोसा नहीं है। शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी पाने के लिए या व्यवसाय की दुनिया में कदम रखने के वक्त परीक्षा के लिए लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाएं देश और प्रदेश के स्तर पर बनाई गई थीं और बहुत हद तक उनकी साख अब भी अक्षुण्ण बनी हुई है। परंतु परीक्षा का विस्तार जिस तरह हो रहा है, वह आश्चर्यजनक है। अब शिक्षा की अवधि और प्रकार में बड़ा बदलाव आया है और उसी के साथ परीक्षा नामक व्यवस्था का हर तरफ़ विस्तार हुआ है। अब शिक्षा के क्रम में परीक्षा की चुनौती नया रूप ले रही है। आगे की शिक्षा पाने की पात्रता का आधार क्या हो और उसका पिछली पढ़ाई के साथ क्या रिश्ता हो यह गंभीर मुद्दा बन चुका है। हायर सेकेंडरी या ग्रेजुएट स्तर की परीक्षा के प्राप्तांक स्वयं में अब कोई खास अर्थ नहीं रखते। बीए/ बीएससी/ बी काम/ एलएलबी जैसी किसी भी स्नातक स्तर की कक्षा में प्रवेश के लिए भी एनटीए द्वारा आयोजित सीयूईटी की राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा देना जरूरी है।
दरअसल, औपचारिक शिक्षा की उपयुक्तता संदिग्ध हो चली है और उसमें छात्र की उपलब्धि उसकी पात्रता को बताने के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए शिक्षा के आयोजन में परीक्षा अब एक स्वतंत्र व्यवस्था के रूप में संचालित की जा रही है। उसके लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) जैसी अलग विशाल संस्था खड़ी की गई है। मुश्किल यह है कि अब उसकी प्रक्रियाओं को लेकर भी शंका और संदेह उठ रहे हैं। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत मूल्यांकन को शिक्षा से स्वतंत्र नहीं बल्कि शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। उसके हिसाब से मूल्यांकन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और उसका लाभ शिक्षा अर्जित करते समय सीखने की प्रक्रिया को पुष्ट करने के रूप में शिक्षार्थी को मिलना चाहिए। इस नीति में परीक्षा को तनावमुक्त बनाने पर भी ज़ोर दिया गया है। पर सच्चाई कुछ और है। परीक्षा के दबाव को झेलने वाले छात्रों को अवसाद, अभिभावकों को दुश्चिंता और तनाव होना आम बात होती जा रही है। खबर है कि नीट की परीक्षा से त्रस्त एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली।
परीक्षा बहुत से छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रही है। उसके लिए भी उच्चतम न्यायालय ने सरकार को फटकार लगाई है और सरकार की ओर से कमेटी भी बन गई है। कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। काश इन जांचों, समितियों और उनकी संस्तुतियों को लेकर कुछ ठोस कदम भी उठाए जाते। जरूरी है कि उनके सुझावों को ठंडे बस्ते में न डालकर उन पर अमल करने की दिशा में हम आगे बढ़ें। देश के भविष्य के लिए शिक्षा की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) पर विचार करना जरूरी है। छात्रों के स्वास्थ्य और हित को सुरक्षित रखने का उद्यम सभी का एक साझा दायित्व है।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

